गीता श्लोक 17/02…
शास्त्र विधि जानने वाले या न जानने वाले पुरुष में श्रद्धा तो होती ही है …
भगवान कहते हैं कि वह स्वभाव से उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्विकी राजसी और तामसी, ऐसे तीन तरह की होती है, उसको तुम मुझे सुनो ।
भगवान कहते हैं कि श्रद्धा तीन तरह की होती है _
एक _संगजा
दूसरी_ शास्त्रजा और
तीन _स्वभावजा
वह श्रद्धा स्वभावजा है अर्थात स्वभाव से पैदा हुई है अथवा स्वत सिद्ध श्रद्धा है । वह न तो संग से पैदा हुई है और न शास्त्रों से पैदा हुई है। वह तो स्वाभाविक इस प्रवाह में बह रहे और देवताओं आदि का पूजन करते जा रहे हैं । स्वभावजा श्रद्धा भी तीन तरह की होती है एक _ सात्विकी
दो _राजसी और
तीन _ तामसी
हे अर्जुन! अब तुम उन तीनों को अलग-अलग सुनो । अर्जुन की दृष्टि में सत्य अर्थात दैवी संपत्ति और आसुरी संपत्ति दो ही संपत्ति हैं । भगवान भी बंधन की दृष्टि से राजसी और तामसी दोनों को आसुरी संपत्ति ही मानते हैं ।
जो लोग सकाम भाव से शास्त्र विहित कर्म करते हैं, अतः वे स्वर्गआदि ऊंचे लोगों में जाकर और वहां के भोगों को भोगकर पुण्यक्षीण होने पर फिर मृत्यु लोक में अर्थात पृथ्वी पर वापस लौट आते हैं । परंतु तामस मनुष्य शास्त्र विहित कर्म नहीं करते , अतः वे कामना और मूढ़ता के कारण अधम गति में जाते हैं । इस राजस और तामस दोनों में मनुष्यों का बंधन बना रहता है ।
गीता श्लोक 17/03…..
श्रद्धा के भी तीन भेद…..
भगवान कहते हैं कि हे भारत अर्जुन ,! सभी मनुष्यों की श्रद्धा अंतकरण के अनुरूप होती है । यह मनुष्य श्रद्धामय है । इसलिए जो श्रद्धा वाला है, वही उसका स्वरूप है अर्थात वही उसकी ईश्रद्धा या निष्ठा है ।
सत्य का अर्थ अंतःकरण भी होता है । अतः जैसा अंतःकरण वैसी ही श्रद्धा अर्थात अंतः करण के अनुरूप ही श्रद्धा होती है । उसमें सात्विक, तामस या राजस जैसे संस्कार होते हैं, वैसी ही श्रद्धा होती है ।
जो शास्त्र विधि को न जानते हों, और देवता आदि का पूजन करते हों, उनकी ही नहीं वरन, जो शास्त्र विधि को जानते हों अथवा न जानते हों अथवा न मानते हों, अनुष्ठान करते हों अथवा नहीं करते हों, किसी जाति के या किसी वर्ण के, किसी आश्रम या किसी समुदाय के, या किसी देश के, कोई व्यक्ति क्यों न हों, उन सभी की स्वाभाविक श्रद्धा तीन प्रकार की होती है ।
गीता श्लोक 17/04….
साधकों की श्रद्धा अलग अलग होती है……..
भगवान कहते हैं कि सात्विक मनुष्य देवताओं का पूजन करते हैं । राजस मनुष्य राक्षसों और यक्षों का और दूसरे जो तमस मनुष्य है वह प्रेतों और भूतों का पूजन करते हैं ।
सात्विक पुरुष अर्थात देवी संपत्ति वाले मनुष्य देवताओं का पूजन करते हैं । देवताओं से तात्पर्य विष्णु, शंकर, गणेश, शक्ति और सूर्य , यह पांच ईश्वर कोटि अर्थात श्रेणी के देवता हैं । वह दैवी शक्ति जिनमें प्रकट होती है, दैवी संपत्ति वाले साधकों की स्वाभाविक श्रद्धा की पहचान बताने के लिए ही इस श्लोक में यजनते पद आया है । ईश्वर कोटी के देवताओं में भी साधकों की श्रद्धा अलग-अलग होती है । किसी भी श्रद्धा भगवान विष्णु में, तो किसी की श्रद्धा भगवान शंकर में और किसी की गणेश जी में होती है ईश्वर के जिस रूप में उनकी स्वाभाविक श्रद्धा होती है, उसी का वह विशेषता से पूजन और यजन करते हैं । राजस मनुष्यों यक्षों तथा राक्षसों का पूजन करते हैं । यक्ष राक्षस भी देव योनियों में है । यक्ष में धन के संग्रह की प्रधानता होती है और राक्षसों में कष्ट दूर करने की क्षमता होती है । अपनी कामना पूर्ति के लिए एवं दूसरों के विनाश के लिए राजस मनुष्यों में यक्षों और राक्षसों का पूजन करने की प्रवृत्ति होती है ।
गीता श्लोक 17/05 एवं 17/06
शास्त्र विधि का त्याग करने वाले पुरुष…….
भगवान कहते हैं कि जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित घोर तप करते हैं, जो दंभ और अहंकार से अच्छी तरह युक्त हैं, जो भोग पदार्थ, आशक्ति और बल से युक्त हैं, जो शरीर में स्थित पांच भूतों को, पांच भौतिक शरीर को तथा अंतःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृष करने वाले हैं, उन अज्ञानियों को तू आसुर निष्ठा वाले अथवा आसुरी निष्ठा वाले समझ ।
श्रद्धा रहित मनुष्यों की रुचि ऐसे घोर तप करने में होती है, जो शास्त्र के विधान में नहीं है अर्थात शास्त्र के विधान के अनुसार निषेध है । उनकी रुचि हमेशा शास्त्र के विपरीत होती है । तामसी बुद्धि होने से वह स्वयं तो शास्त्रों को जानते ही नहीं और अन्य कोई बता दे, तो वह न तो उसको मनाना चाहते हैं और न उसके अनुसार करना ही चाहते हैं ।
वे समझ बैठे हैं कि संसार में जितने भजन, ध्यान, स्वाध्याय हैं, वे सब दंभ हैं और उनको मानने वाले दंभी हैं । काम शब्द भोग वादी पदार्थ का वाचक है, उन पदार्थों में मिल जाना, तल्लीन हो जाना, एक रस हो जाना, राग़ है एवं उनका बलपूर्वक बनाए रखने का जो दुराग्रह है, वह हठ कहलाता है । प्राप्त सामग्री को भोगने में भी सदा तल्लीन रहते हैं और धन संपत्ति याद भोग सामग्री को प्राप्त करने के लिए हठ पूर्वक या जिद से तप किया करते हैं ।
गीता श्लोक 17/7….
भोजन की रुचि से भी मनुष्य की श्रद्धा पहचानी जा सकती है ….
भगवान कहते हैं की आहार सबको तीन प्रकार का प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं अर्थात शास्त्री कर्मों में भी गुणों को लेकर तीन प्रकार की रुचि होती है । हे अर्जुन! तू उनके भेद को सुन ।
मनुष्यों की निष्ठा की परीक्षा के लिए सात्विक, राजस्व और तामस तीन प्रकार के यजन बताए गए हैं । परंतु जिनकी श्रद्धा रुचि, प्रियता, यजन, पूजन में नहीं है, उनकी निष्ठा की पहचान के लिए बताया गया है कि जिनकी यजन, पूजन में श्रद्धा नहीं है । ऐसे मनुष्यों को वाह्य निर्वाह के लिए भोजन तो करना ही पड़ता है । चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक । उनकी निष्ठा की पहचान के लिए यजन पूजन ही नहीं है, वरन भोजन की रुचि से ही उनकी निष्ठा की पहचान हो जाएगी ।
गीता श्लोक 17/08…
सात्विक पुरुष के भोज्य पदार्थ ….
भगवान कहते हैं कि आयु, सतगुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता बढ़ाने वाले, स्थिर रहने वाले, हृदय को शक्ति देने वाले, रस युक्त तथा चिकने ऐसे आहार पदार्थ अर्थात भोजन करने के पदार्थ, सात्विक मनुष्य को प्रिय होते हैं ।
जिन आहारों के करने से आयु बढ़ती है, सतगुण बढ़ता है, शरीर, मन, बुद्धि, आदि में सात्विक बल एवं उत्साह पैदा होता है, शरीर में निरोगिता बढ़ती है, सुख शांति पैदा होती है और जिनको देखने से ही प्रीत पैदा होती है, वह आहार सत्वगुन वाले पुरुषों को अच्छे लगते हैं ।
जो भोजन गरिष्ठ नहीं होते, सुपाच्य होते हैं और जिनके सार (रस) बहुत दिनों तक शरीर में शक्ति देते है, हृदय, फेफड़े आदि को शक्ति देने वाले तथा बुद्धि आदि में सौम्यभाव लाने वाले, फल, दूध, रस आदि पदार्थ, घी, मक्खन, बादाम आदि एवं सात्विक पदार्थ से निकले हुए तले, तेल, स्नेह, युक्त भोजन के पदार्थ, जो अच्छे से पके हुए यथा ताजे होते हैं, वह सात्विक पुरुष के प्रिय भोजन होते हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता- कालीचरण राजपूत





