आलेख – भारत में रेलों का आगमन –
✍️डॉ रघुराज सिंह कर्मयोगी
बच्चो,आज जो भारत में रेलवे है। उसको भारत में कौन लाया ? आपका उत्तर होगा ब्रिटिशर्स। आपको पता होना चाहिए कि वह तो केवल व्यापारी के रूप में भारत आए थे। उनका उद्देश्य भारत में अपना माल बेचना था। वह भारत में रेल चलाना ही नहीं चाहते थे। लेकिन यहां रेल चलाना एक भारतीय का सपना था। इसलिए भारत में रेलवे अंग्रेजों के कारण नहीं बल्कि श्री नाना जगन्नाथशंकर सेठ के कारण रेलवे भारत में आयी। भारत में रेलवे आरम्भ करने का श्रेय अंग्रेजों को दिया जाता है। जबकि श्री नाना जगन्नाथ शंकर सेठ को भूले हुए हैं। उन्हें कोई जानता ही नहीं। श्री नाना जगन्नाथ शंकर सेठ मुर्कुटे के योगदान से मैं आपको परिचित कराता हूं।
“हां हां गुरुजी बताइए। हम भी जानना चाहते हैं कि श्री नाना जगन्नाथ शंकर सेठ कौन थे ?
“तो सुनो। देखो १५ सितंबर १८३० को दुनिया की पहली इंटरसिटी ट्रेन इंग्लैंड में लिवरपूल और मैनचेस्टर के बीच चलाई गई थी। यह समाचार पूरी दुनिया में आग की तरह है फैल गया। यह समाचार मुंबई के एक व्यक्ति को अच्छा नहीं लगा लगा। उन्होंने सोचा कि उनके गांव में भी रेल चलनी चाहिए। उन दिनों अमेरिका में भी रेल चल ही रही थी। भारत एक गरीब देश जिस पर अंग्रेज राज करते थे। यहां का एक व्यक्ति रेलवे का स्वप्न देख रहा था। कोई और होता तो जनता उसे स्वीकार नहीं करती। लेकिन वह साधारण सेठ नहीं थे। बल्कि बंबई के साहूकार श्री नाना शंकर सेठ थे। उनसे ईस्ट इंडिया कंपनी तक ऋण लिया करती थी। यह बात आश्चर्जनक लगती है। क्योंकि अंग्रेजों के पास धन की कमी नहीं थी। उन्होंने भारत के संसाधनों को लूट कर अपनी तिजोरिया भरी थी।
श्री नाना शंकरशेठ का वास्तविक नाम जगन्नाथ शंकर मुर्कुटे था। जो मुंबई से लगभग १०० किमी. दूर मुरबाड़ में रहते थे। उनका परिवार पीढ़ियों से खानदानी अमीर था। उनके पिता नामी साहूकार थे। उनका एक मात्र पुत्र नाना थे। बालक शंकरसेठ मुंह में सोने की चम्मच ले कर पैदा हुए थे। धन के साथ-साथ ज्ञान और पिता का उन पर विशेष आशीर्वाद था। अध्यापक रख कर पुत्र को अन्य विषयों के साथ अंग्रेजी की शिक्षा भी देने की व्यवस्था की थी। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने व्यवसाय का विशाल स्तर पर विस्तार किया।
जब विश्व के अनेक देश अंग्रेजों के सामने नतमस्तक थे। तब ब्रिटिश अधिकारी नाना शंकरशेठ के आशीर्वाद के लिए गिड़गिड़ाते थे। कई अंग्रेज उनके अच्छे मित्र थे। मुंबई विश्वविद्यालय,एलफिन्स्टन कॉलेज, ग्रांट मेडिकल कॉलेज,लॉ कॉलेज,जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स, बंबई में बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय एवं बंबई विश्व विद्यालय जैसे शिक्षा संस्थान नाना द्वारा ही संचालित किये जाते थे ।
श्री नाना शंकर सेठ ने मुंबई में रेलवे प्रारंभ करने का विचार बनाया। इस परियोजना को कार्य रूप देने के लिए वह पिता के मित्र सर जमशेदजी उर्फ जेजे के पास गए। उन्होंने सर जेजे के समक्ष अपनी योजना का प्रस्ताव रखा। एक बार इंग्लैंड के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश सर थॉमस एर्स्किन पैरी भारत पधारे। नाना ने उनसे विचार विमर्श किया कि क्या पारले मुंबई में रेलवे का संचालन आरंभ किया जा सकता है? यह विचार सुन कर सर थॉमस आश्चर्य में पड़ गए। काफी मंथन के बाद सहमति बनने के बाद तीनों ने भारत में इंडियन रेलवे एसोसिएशन की स्थापना की।
उस समय कंपनी सरकार ने भारत में रेलवे को धरातल पर उतारने के बारे में सोचा ही नहीं था। जब श्री नाना शंकर सेठ,सर जेजे,सर पैरी जैसे लोगों ने कहा कि हम भारत में रेल चलाना चाहते है तो ब्रिटिश सरकार को ध्यान देना पड़ा। 14 जुलाई 1844 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने सरकार को एक प्रस्ताव पेश किया ।
मुंबई से कितनी दूर तक रेल की पटरी बिछाई जा सकती है? इस पर प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार करने के लिए सरकारी गजट में आदेश पारित किया गया। उसके पश्चात “बॉम्बे कमेटी” का गठन हुआ। उन्होंने अंग्रेज व्यापारियों, अधिकारियों, बैंकरों को एकत्रित किया। ग्रेट इंडियन पेनासुला रेलवे की स्थापना की। जिसे आज भारतीय रेल के नाम से जाना जाता है ।
“गुरुजी, उन दिनों पटरियां बिछाने का काम बहुत
रहा होगा। क्योंकि आजकल की तरह मशीनी सुविधाएं उन दिनों नहीं थी”।
“तुमने बहुत अच्छा सवाल किया है, लकी”। कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। अंततः वह दिन आ ही गया। जब 16 अप्रैल 1853 को मध्यान्ह 3-30 बजे ट्रेन मुम्बई के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे के लिए रवाना हुई। जो सवा घंटे बाद 4:45 बजे ठांणे पहुंची। इस ट्रेन में भाप से चलने वाले सुल्तान, सिंध और साहिब नाम के लोकोमोटिव इंजन लगे थे। उद्घाटन यात्रा के समय ट्रेन के यात्रियों में श्री नाना शंकर सेठ एवं जमशेदजी भाई टाटा बैठे थे। इस ट्रेन में लॉर्ड फॉकलैंड का एक सैलून विशेष रूप से लगाया गया था। जो मुंबई के गवर्नर थे। उन्हें 21 तोपों की सलामी दे कर ट्रेन को रवाना किया गया था। पहली यात्रा के अवसर पर इस सवारी गाड़ी को फूल मालाओं से सजाया गया था। नमन है जीवट के धनी ऐसे श्री नाना शंकरसेठ जी को।
बच्चो,इस गाड़ी में 400 विशिष्ट अतिथि बैठे हुए थे। उनमें ईस्ट इंडिया कंपनी के संचालक भी साथ थे। वे सब 17 अप्रैल को वापस मुंबई लौट आए। इस कार्यक्रम का गवर्नर लॉर्ड फाकलैंड ने विशाल जन समुदाय के समक्ष उद्घाटन किया। रेल लाइन डालने का कार्य 31 अक्टू. 1850 को प्रारंभ हुआ था। इस में एक हजार से अधिक श्रमिकों ने कार्य किया। जो 25 माह के रिकार्ड समय में पूरा हुआ था।।
नोट- उपरोक्त रचना अप्रकाशित और मौलिक है.
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