समुद्र मंथन ……
रचना के. सी. राजपूत, कोटा।
धर्म ग्रंथ ऐसा ही कहते, जलधि से निकले चौदह रत्न ।
देव दनुज दिनों ने मिलकर, अच्छा खासा किया प्रयत्न ।।
खूब मथा था वारि सिंधु का, तरल हलाहल पाया ।
थी दोनों की कठिन परीक्षा, झेल न कोई पाया ।।
विष को जो भी पी जाएगा, होगा परिणाम भयंकर ।
बढ़ा नहीं जब कोई आगे, तब खड़े हो गए शंकर ।
जैसे गरल हलक में पहुंचा, शिव कंठ हो गया नीला ।
कालकूट तो पचा गए शिव, थी यही प्रभु की लीला ।।
बाकी रतन दुखद नहीं थे, था पहला बड़ा भयंकर ।
साहस कोई जुटा न पाया, संहर्ष से पी गए शंकर ।।
एक कष्ट तो दूर हुआ, तब बोले सब जन हर हर ।
जय जय सब देव कर रहे, कर करके ऊंचे कर ।।
कौस्तुभ उच्चैनश्रवा ऐरावत और कामधेनु थे सुंदर ।
लक्ष्मी रंभा कल्पवृक्ष सब, मिले उदधी के अंदर ।।
पांचजन्य कल्पवृक्ष वारुणि और अमी थे ।
धनवंतरी और देवतरू निकले, चौड़ा रत्न सभी थे ।।
हमारा है स्वत्व अमी पर, देव दनुज भए आगे ।
बढ़ी कलह देखकर विष्णु, अमृत लेकर भागे ।
तभी स्वयं नारायण ने, झट मोहिनी रूप बनाया ।
घूरते ही रह गए निशाचर, देवों ने अमृत पाया ।।
देवों ने अमृत पाया ….
देवों ने अमृत पाया…..
रचना के. सी. राजपूत, कोटा।
समुद्र मंथन- कालीचरण राजपूत






