Saturday, April 18, 2026
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समुद्र मंथन- कालीचरण राजपूत

समुद्र मंथन ……

रचना के. सी. राजपूत, कोटा।

 

धर्म ग्रंथ ऐसा ही कहते, जलधि से निकले चौदह रत्न ।

देव दनुज दिनों ने मिलकर, अच्छा खासा किया प्रयत्न ।।

खूब मथा था वारि सिंधु का, तरल हलाहल पाया ।

थी दोनों की कठिन परीक्षा, झेल न कोई पाया ।।

विष को जो भी पी जाएगा, होगा परिणाम भयंकर ।

बढ़ा नहीं जब कोई आगे, तब खड़े हो गए शंकर ।

जैसे गरल हलक में पहुंचा, शिव कंठ हो गया नीला ।

कालकूट तो पचा गए शिव, थी यही प्रभु की लीला ।।

बाकी रतन दुखद नहीं थे, था पहला बड़ा भयंकर ।

साहस कोई जुटा न पाया, संहर्ष से पी गए शंकर ।।

एक कष्ट तो दूर हुआ, तब बोले सब जन हर हर ।

जय जय सब देव कर रहे, कर करके ऊंचे कर ।।

कौस्तुभ उच्चैनश्रवा ऐरावत और कामधेनु थे सुंदर ।

लक्ष्मी रंभा कल्पवृक्ष सब, मिले उदधी के अंदर ।।

पांचजन्य कल्पवृक्ष वारुणि और अमी थे ।

धनवंतरी और देवतरू निकले, चौड़ा रत्न सभी थे ।।

हमारा है स्वत्व अमी पर, देव दनुज भए आगे ।

बढ़ी कलह देखकर विष्णु, अमृत लेकर भागे ।

तभी स्वयं नारायण ने, झट मोहिनी रूप बनाया ।

घूरते ही रह गए निशाचर, देवों ने अमृत पाया ।।

देवों ने अमृत पाया ….

देवों ने अमृत पाया…..

रचना के. सी. राजपूत, कोटा।

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