Saturday, April 18, 2026
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श्रीम‌द्भगवद्गीता- कालीचरण राजपूत

 गीता श्लोक 15/10…

जीवात्मा को कौन जाना पाता है?……

भगवान कहते हैं कि शरीर को छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीर में स्थित हुए अथवा विषयों को भोगते हुए भी गुणों से युक्त जीवात्मा के स्वरूप को मूढ़ मनुष्य नहीं जानते । ज्ञान रूपी नेत्रों वाले ज्ञानी मनुष्य ही जानते हैं ।

शरीर छोड़ने समय मनुष्य अर्थात जीव सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर को लेकर प्रस्थान करता है । जब तक हृदय में धड़कन रहती है, तब तक जीव का प्रस्थान नहीं माना जाता । धड़कन बंद होने के बाद भी जीव कुछ समय के लिए रह सकता है । चेतन तत्व का आवागमन नहीं होता । केवल प्राणों का ही आवागमन होता है । परंतु सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर का संबंध होने के कारण जीव का आवागमन कहा जाता है ।

मनुष्य जो भोगों को भोग़ता है, तब अपने को बड़ा सावधान मानता है और विषय सेवन में सावधान रहता है । सावधानी रखने पर भी वह मूर्ख अर्थात अज्ञानी ही है, क्योंकि विषयों के प्रति यह सावधानी किसी काम की नहीं । वरन नरको में और नीचे योनियों में ले जाने वाली है ।

श्लोक 15/11…

अविवेकी मनुष्य यत्न करने पर भी तत्व का अनुभव नहीं करते..

भगवान कहते हैं कि यत्न करने वाले योगी लोग अपने आप में स्थित इस परमात्मतत्व का अनुभव करते हैं । परंतु जिन्होंने अपना अंतःकरण शुद्ध नहीं किया है, ऐसी अविवेकी मनुष्य यत्न करने पर भी तत्वों का अनुभव नहीं करते ।

भगवान को पाने की भीतरी लगन, जिसे पूर्ण किए बिना ठीक से न रहा जाए, “यतन” कहलाती है । Pजो सांख्य योगी सत्य असत के विचार द्वारा सत् असत तत्व की प्राप्ति और सत्य असत संसार की निवृत्ति करना चाहते हैं, विवेक की सर्वथा जागृति होने पर वे अपने आप में स्थित परमात्मतत्व का अनुभव कर लेते हैं । परमात्मतत्व से देश, काल की दूरी नहीं है । वह समान रूप से सर्वत्र एवं सदैव विद्यमान है । वही सब भूतों के हृदय में स्थित सब की आत्मा है । इसलिए योगी लोग अपने आप ही इस तत्व का अनुभव कर लेते हैं । संसार बदलने वाला है । संसार का ही अंश होने के कारण “मैं” भी बदलने वाला है । संसार की तरह “मैं” भी उत्पन्न और नष्ट होने वाला है ।

 

गीता श्लोक 15/12…

सूर्य और चंद्रमा का तेज मेरा ही जानो……

भगवान कहते हैं कि सूर्य को प्राप्त हुआ जो तेज संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है और जो तेज चंद्रमा में है तथा जो तेज अग्नि में है, उस तेज को मेरा ही जान ।

भगवान कहते हैं कि प्रभाव और महत्व की ओर आकर्षित होना मनुष्य का स्वभाव है । प्राकृतिक पदार्थ के सहयोग से अथवा संबंध से जीव प्राकृतिक पदार्थों के प्रभाव से प्रभावित हो जाता है । प्रकृति में स्थित होने के कारण जीव को प्रकृत पदार्थ का महत्व दिखाई देने लगता है । परंतु भगवान का नहीं । इस प्रभाव का वर्णन करते हुए भगवान कहते हैं कि उन प्राकृत पदार्थ में जो प्रभाव और महत्व देखने में आता है, वह मूलतः मेरा ही है । सर्वोपरि प्रभावशाली मैं ही हूं । मेरे ही प्रकाश से सब प्रकाशित हो रहे हैं ।

गीता श्लोक 15/13..

समस्त वनस्पतियों की पुष्टि मैं ही करता हूं ….

भगवान कहते हैं कि मैं ही धरा में प्रविष्ट होकर, अपनी शक्ति से, समस्त प्राणियों को धारण करता हूं और मैं ही रस रूप चंद्रमा होकर समस्त औषधियों अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं ।

ऐसा कहा जाता है कि, यहां पर स्वयं भगवान का रहे हैं कि, मैं ही धरा में प्रवेश करके उस पर स्थित संपूर्ण स्थावर _ जंगम प्राणियों को धारण करता हूं । पृथ्वी में जो धारण शक्ति है, वह पृथ्वी की अपनी नहीं होकर, वह भगवान की ही है । वैज्ञानिकों के द्वारा ऐसा बताया गया है कि पृथ्वी पर थल की अपेक्षा जल का भाग अधिक है, परंतु ऐसा होने पर भी पृथ्वी जलमग्न नहीं होती है । यह भगवान की धारण शक्ति का ही प्रभाव है । पृथ्वी में इन औषधियां के उत्पन्न करने की शक्ति एवं गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी भगवान की ही समझनी चाहिए ।

गीता श्लोक 15/14…

मैं ही प्राणियों की पाचन शक्ति हूं । भगवान कहते हैं कि प्राणियों के शरीर में रहने वाला प्राण, अपान से युक्त वैश्वानर अर्थात जठराग्नि होकर, चार प्रकार के भोजन को बचाता हूं ।

अब भगवान कहते हैं कि जीवों में पाचन शक्ति अर्थात वैश्वानर रूप में मैं ही हूं । अग्नि के दोनों कार्य_ प्रकाश करना और पचना भगवान की शक्ति से ही होते हैं । प्राणियों के शरीर को पुष्ट करने तथा उनके प्राणों की रक्षा करने के लिए भगवान ही वैश्वानर अर्थात जठराग्नि के रूप में उन प्राणियों के शरीर में रहते हैं । मनुष्यों की तरह लता, वृक्ष आदि स्थावर प्राणी और पशु, पक्षी आदि जंगम प्राणियों में भी वैश्वानर की पाचन शक्ति काम करती है । इसी पाचन से उनके शरीर वृद्धि होती है।

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