Monday, September 28, 2026
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“ओम बिरला: संवाद की संसदीय गरिमा और कोटा का गौरव”

✍️ रवि सामरिया (स्वतंत्र पत्रकार)

कोटा की मिट्टी में जब कोई सामान्य जनप्रतिनिधि राष्ट्र की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था लोकसभा का अध्यक्ष बन जाए, तो यह न केवल एक व्यक्ति की सफलता है, बल्कि पूरे क्षेत्र का सम्मान है। ओम बिरला जी, कोटा-बूंदी से तीन बार सांसद रह चुके, आज पूरे देश में संसदीय मर्यादा, संवादशीलता और विकासोन्मुख नेतृत्व का प्रतीक बन चुके हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह भले ही भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक पर आसीन हैं, लेकिन जमीन से जुड़े रहना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। वे आज भी कोटा के सामान्य नागरिकों, विद्यार्थियों और व्यापारियों से उसी आत्मीयता से मिलते हैं, जैसे पहले मिलते थे। यही जुड़ाव उन्हें आम नेता से अलग करता है।

– संसदीय गरिमा के संरक्षक:

ओम बिरला जी के कार्यकाल में लोकसभा में शांति, सौहार्द और बहस की गुणवत्ता में स्पष्ट सुधार देखा गया। उन्होंने विपक्ष को उतनी ही सम्मानपूर्वक जगह दी, जितनी सरकार को दी जाती है – यह लोकतंत्र की आत्मा है। उन्होंने यह सिखाया कि असहमति का मतलब शत्रुता नहीं, बल्कि संवाद और सहमति का अवसर होता है।

– कोटा के विकास में अग्रणी भूमिका:

कोटा रेलवे स्टेशन का आधुनिकीकरण, बूंदी और कोटा को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण, शैक्षिक शहर के रूप में कोटा की ब्रांडिंग, आयुर्वेद विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज और खेल सुविधाओं का विस्तार, इन सभी क्षेत्रों में ओम बिरला जी की रणनीतिक भागीदारी रही है। उन्होंने कोटा को केवल कोचिंग नगरी के रूप में नहीं, बल्कि एक विकसित स्मार्ट सिटी के रूप में ढालने की दिशा में कई योजनाएं क्रियान्वित की हैं।

– जन संवाद के महारथी:

मैंने व्यक्तिगत रूप से ओम बिरला जी को देखा और अनुभव किया हैं। वे एक ऐसे राजनेता हैं जो हर वर्ग के व्यक्ति की बात धैर्य से सुनते हैं। चाहे कोई व्यापारी समस्या लेकर जाए, विद्यार्थी, शिक्षक या वृद्ध – हर कोई उनसे सहज होकर मिल सकता है। उनका दरवाजा आमजन के लिए हमेशा खुला रहता है।

– समाज और संसद का संतुलन:

जहाँ संसद में उनकी छवि एक गंभीर और अनुशासित अध्यक्ष की है, वहीं समाज में वे एक सरल, सुलभ और आत्मीय व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। यही उनका व्यक्तित्व उन्हें विशिष्ट बनाता है।

ओम बिरला केवल लोकसभा अध्यक्ष नहीं, बल्कि कोटा की आत्मा हैं। वे इस शहर का गौरव हैं और लोकतंत्र की गरिमा के रक्षक हैं। ऐसे व्यक्तित्व पर लेख लिखना मेरे लिए केवल एक पत्रकारिता नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव है। भारत को ऐसे ही संयमित, संवेदनशील और संवादप्रिय नेताओं की आवश्यकता है।

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