गीता श्लोक 14/20…
मनुष्य अमरता को प्राप्त करता है………
भगवान कहते हैं कि देहधारी विवेकी मनुष्य देह को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करके तीनों गुणों को जीत कर जन्म मृत्यु और वृद्धावस्था रूप दुखों से रहित हुआ अमरता का अनुभव करता है ।
देह को उत्पन्न करने वाले गुण ही तो हैं, जिस गुण के साथ मनुष्य अपना संबंध मान लेता है, उसके अनुसार उसको ऊंच या नीच योनियों में जन्म लेना ही पड़ता है । विचारवान मनुष्य इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कर जाता है अर्थात उनके साथ अपना संबंध नहीं रखता क्योंकि उसको यह स्पष्ट विवेक हो जाता है कि सभी गुण परिवर्तनशील हैं अर्थात उत्पन्न और नष्ट होने वाले हैं और अपना स्वरूप गुणों से कभी लिप्त हुआ ही नहीं और हो भी नहीं सकता । जिस प्रकृति से गुण उत्पन्न होते हैं, उस प्रकृति के साथ भी “स्वयं”( ईश्वर) का बिल्कुल भी संबंध नहीं है, फिर इन गुणों के साथ उसका संबंध कैसे हो सकता है । जो गुणों से सर्वथा निर्लिप्त रहता है, उसको स्वत सिद्ध अमरता का अनुभव हो जाता है ।
गीता श्लोक 14/21
हे प्रभु! गुनातीत पुरुष के लक्षण बताएं …..
अर्जुन बोले हे प्रभु ! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ मनुष्य, किन लक्षणों से युक्त होता है? उसके आचरण कैसे होते हैं ? और इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है ?
अर्जुन भगवान से पूछ रहे हैं कि हे प्रभु ! मैं यह जानना चाहता हूं कि जो गुणों का अतिक्रमण कर चुका है, ऐसे मनुष्य के क्या लक्षण होते हैं ? अर्थात संसारी मनुष्य की अपेक्षा गुनातीत मनुष्य में ऐसी कौन सी विलक्षणता आ जाती है कि साधारण व्यक्ति भी समझ ले कि यह गुनातीत पुरुष है ?
उस गुनातीत पुरुष के आचरण कैसे होते हैं? अर्थात साधारण मनुष्य की जैसी दिनचर्या और रात्रि चार्य होती है अथवा उससे अलग या विलक्षण होती है ? जैसा खान-पान, जैसा रहन-सहन होता है, जैसा सोना जगना होता है, गुणातीत मनुष्य के आचरण खान-पान आदि भी वैसे ही होते हैं ? या कुछ विलक्षण अथवा विशेष प्रकार के होते हैं ? इन तीन गुणों का अतिक्रमण अर्थात पार करने का क्या उपाय है? अर्थात कौन सा साधन करने से मनुष्य गुना अतीत हो सकता है ?
गीता श्लोक 14/22..
गुनातीत मनुष्य के लक्षण…
श्री भगवान बोले थे हे पांडव अर्जुन ! प्रकाश और प्रवृत्ति तथा मोह ये सभी अच्छी तरह से प्रवृत्त हो जाएं, तो भी गुनातीत मनुष्य इससे द्वेष नहीं करता और यह सभी निवृत हो जाए तो उनकी इच्छा नहीं करता ।
इंद्रियों और अतःकारण की स्वच्छता और निर्मलता का नाम प्रकाश है । जिससे इंद्रियों के द्वारा शब्द आदि पांचो विषयों का स्पष्टतया ज्ञान होता है । मन से मनन होता है और बुद्धि से निर्णय होता है, उसका नाम प्रकाश है ।
सत्यगुण की दो वृत्ति भगवान पहले बता चुके हैं, और वह हैं प्रकाश और ज्ञान । सत्यगुन में तो प्रकाश वृत्ति ही मुख्य हैं । क्योंकि जब तक इंद्रियां और अंतःकरण में प्रकाश नहीं आता, स्वच्छता, निर्मलता नहीं आती और तब तक ज्ञान जागृत नहीं होता । प्रकाश के आने पर ही ज्ञान जागृत होता है । अतः यहां ज्ञान वृत्ति को प्रकाश के ही अंतर्गत जानना चाहिए ।
जब मनुष्य गुनातीत हो जाता है, तब रजोगुण के साथ तालमेल रखने वाली वृत्तियां तो पैदा हो ही नहीं सकती ।
गीता श्लोक 14/23..
गुनातीत मनुष्य के लक्षण…
भगवान कहते हैं कि जो उदासीन की तरह स्थित है और जो गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही गुणों में वरत रहे हैं, इस भाव से जो अपने स्वरूप में ही स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता ।
पक्षपाती _ यदि दो पुरुष में कोई विवाद चल रहा है और यदि कोई तीसरा पुरुष बिना दोनों की बात सुने एक पुरुष के पक्ष में फैसला दे दे, तो उसे पक्षपाती कहते हैं ।
मध्यस्थ _ यदि तीसरा पुरुष विवाद करने वाले दोनों पुरुषों का पक्ष सुनकर सही फैसला दे, तो उसे मध्यस्थ कहते हैं ।
उदासीन_ यदि तीसरा पुरुष न तो दोनों की बात ही सुने और न कोई निर्णय किसी के भी पक्ष में दे । ऐसे पुरुष को उदासीन कहते हैं । इस प्रकार गुनातीत तो मनुष्य संसार और परमात्मा के बीच “उदासीन” की तरह व्यवहार करता है ।
वास्तव में संसार की स्वतंत्रत सत्ता से ही संसार सत्ता वाला दिखाई देता है । जब गुणवती मनुष्य की दृष्टि में संसार की सत्ता है ही नहीं, केवल एक परमात्मा की ही सत्ता है, तो फिर गुनातीत पुरुष उदासीन किससे हो । परंतु जिनकी दृष्टि में संसार और परमात्मा की सत्ता है, ऐसे लोगों की दृष्टि में वह गुनातीत मनुष्य उदासीन की तरह दिखाई देता है ।
गीता श्लोक 14/24, 14/25..
गुनातीत मनुष्य का आचरण..
भगवान कहते हैं कि जो धीर मनुष्य दुख सुख में सम तथा अपने स्वरूप में स्थित रहता है, जो मिट्टी के ढीले, पत्थर और सोने में सम रहता है, जो प्रिय अप्रिय में सम रहता है, जो निंदा स्तुति में सम रहता है, जो मान अपमान में सम रहता है, जो मित्र शत्रु के पक्ष में सम रहता है और जो संपूर्ण कर्मों के आरंभ का त्यागी है, वह मनुष्य गुनातीत कहा जाता है ।
पूर्व कर्मों के अनुसार आने वाली अनुकूल, प्रतिकूल परिस्थिति का नाम सुख-दुख है । प्रारब्ध के अनुसार शरीर, इंद्रियों आदि की अनुकूल स्थिति को सुख कहते हैं और शरीर इंद्रियों आदि की प्रतिकूल परिस्थितियों को दुख कहते हैं । परंतु मनुष्य इन दोनों परिस्थितियों में सम रहता है । क्योंकि सुख-दुख वाली परिस्थितिया उसके अंतःकरण में विकार पैदा नहीं कर सकती अर्थात गुनातीत पुरुष को सुखी या दुखी नहीं कर सकती ।
गुनातीत पुरुष को चाहे पत्थर का टुकड़ा या मिट्टी का ढेला या सोने का टुकड़ा मिल जाए, तब भी वह हर परिस्थिति में सुखी या दुखी नहीं होता । दोनों परिस्थितियों में सम रहता है । उदासीन रहता है।उसका मिट्टी, पत्थर, सोना, चांदी में कोई आकर्षण नहीं होता । मनुष्य की निंदा हो या स्तुति हो, इसमें नाम की मुख्यता होती है । परंतु गुनातीत मनुष्य नाम ( प्रसिद्धि) के साथ अपना कोई संबंध नहीं रखता । चाहे कोई निंदा करें या स्तुति करें । चित्त में चिंता नहीं होती । वह, निंदा करने वालों के प्रति उस की दुश्मनी नहीं और स्तुति करने वालों के प्रति लगाव नहीं रखता ।
गीता श्लोक 14/26
गुनातीत होने का क्या उपाय है?
भगवान कहते हैं कि और जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्ति योग के द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणों का अतिक्रमण करके ब्रह्म प्राप्ति का पात्र हो जाता है ।
भगवान ने पहले के श्लोक में सत्य गुण रजोगुण और तमोगुण तीनों गुणों के अतिक्रमण का उपाय बता दिया है । बाद में शोक 14 /21 में अर्जुन ने गुनातीत होने का उपाय पूछा है । इससे यह प्रतीत होता है कि अर्जुन द्वारा पूछे गए उपाय के अतिरिक्त गुनातीत होने के लिए कोई अन्य उपाय भी जानना चाहते हैं । अतः भगवान ने अर्जुन को भक्ति का अधिकारी समझ कर गुनातीत होने के लिए उपाय “भक्ति” बताया है ।
अभ्यविचारेन पद का तात्पर्य है कि दूसरे का सहारा नहीं हो, सांसारिक सहारा तो दूर रहा, ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग आदि साधनों का भी सहारा न हो । केवल भगवान का ही सहारा हो, आश्रय हो, आशा हो, बल हो, विश्वास हो । इस प्रकार केवल भगवान का ही आश्रय लेने की बात कही गई है ।
गीता श्लोक 14/27..
भगवान की उपासना से साधक ब्रह्म प्राप्ति का अधिकारी ….
भगवान कहते हैं कि क्योंकि ब्रह्म का और अविनाशी अमृत का तथा शाश्वत धर्म का और एकांतिक सुख का आश्रय में ही हूं।
भगवान कहते हैं कि मैं ब्रह्म की प्रतिष्ठा का आश्रय हूं । ऐसा कहने का तात्पर्य ब्रह्म से अपनी अभिन्नता बताने में है । परमात्मा ज्ञान की भक्ति से ब्रह्म है और भक्ति की दृष्टि से ब्रह्म है । परंतु तत्व है भगवान और ब्रह्म एक ही हैं । ऐसा नहीं है कि भगवान कृष्ण अलग हैं और ब्रह्म अलग हैं । ब्रह्म ही कृष्ण है और कृष्ण ही ब्रह्म है । इसी प्रकार साकार और निराकार एक ही हैं, अलग नहीं है ।
भगवान यह भी कहते हैं कि अविनाशी अमृत का अधिष्ठान में हूं मेरा ही अधिष्ठान अविनाशी अमृत है अर्थात अविनाशी अमृत और मैं दो तत्व नहीं है इसी अविनाशी अमृत को प्राप्त को भगवान ने अमृत कहा है । भगवान कहते हैं कि मैं ही सनातन धर्म का आधार हूं और मेरा आधार सनातन धर्म है । तात्पर्य यह हुआ कि सनातन धर्म और मैं दो नहीं है वरन एक ही हैं । सनातन धर्म मेरा ही स्वरुप है ।
अध्याय _15….. श्लोक 15/01
पुरुषोत्तम योग…
संसार वृक्ष……..
भगवान वोले ऊपर की ओर मूल वाले तथा नीचे की ओर शाखा वाले जो संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष को प्रवाह रूप से अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस
संसार वृक्ष को जो जानता है, वह संपूर्ण वेदों को जानने वाला है ।
इस श्लोक के बारे में जानने से पहले हम अपने मस्तिष्क में एक ऐसे पीपल वृक्ष अर्थात अश्वथ वृक्ष को की कल्पना करें जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और तना, शाखाएं, पत्ते आदि नीचे की ओर हैं, ऐसा सोचने अथवा कल्पना करने का कारण भी हम आपको बताएंगे । आओ इस वृक्ष को थोड़ा समझने का प्रयास करते हैं ।
एक_ भगवान संसार में सबसे मुख्य हैं एवं उनका स्थान सर्वोच्च है, वे ही सर्वोपरि हैं, इस संसार वृक्ष की जड़ भी वही हैं अर्थात इस संसार के मूल कारण श्री भगवान ही हैं ।
दो_ इस वृक्ष अर्थात भगवान परमात्मा की शाखाएं भगवान के बाद की समस्त सृष्टि अर्थात ब्रह्माजी, वेद, जीव जंतु, वनस्पतियां आदि सभी, भगवान से नीचे हैं अर्थात भगवान के स्थान से सब का स्थान नीचे है, भगवान का स्थान या पद ही सबसे ऊंचा है, यह कहा जा सकता है कि यह सब भगवान के बाद आते हैं । सबसे ऊंचा स्थान या सबसे ऊंचा पद या सबसे ऊंचा आसन श्री भगवान का ही है और भगवान इस संसार वृक्ष के मूल हैं अर्थात मुख्य जड़ हैं तीन_ भगवान कहते हैं कि यह अश्वत्थ वृक्ष अर्थात पीपल का वृक्ष, अव्यय अर्थात कभी भी खर्च न होने वाला है अर्थात इसमें कभी भी कमी नहीं आती है । चार_ इस वृक्ष को जो जानता है, वह संपूर्ण वेदों को जानता है अर्थात वह सभी वेदों का ज्ञाता है ।
सारांश_
_ भगवान इस विश्व में सर्वोपरि हैं _उनका स्थान सबसे ऊंचा है _भगवान इस संसार वृक्ष की मुख्य जड़ें
_भगवान की नाभि से कमल नाल निकलता है फिर कमल पुष्प उत्पन्न होता है
_कमल से ब्रह्मा जी का उद्भव होता है
_ब्रह्मा जी से चारों वेद की उत्पत्ति होती है
_ब्रह्मा जी से समस्त जीव जंतु पैदा होते हैं
_ब्रह्मा जी से समस्त वनस्पतियां पैदा होती है
इस तरह संसार वृक्ष की उत्पत्ति होती है। भगवान इस संसार वृक्ष की मुख्य जड़ अर्थात मुख्य कारण है । अतः उनका स्थान सर्वोच्च है ।अन्य देवी, देवता, वेद, पुराण, जीव, जंतु, वनस्पतियां बाद में उत्पन्न हुई हैं । अतः उनका स्थान या पद भगवान से नीचे है । अतः वे इस संसार वृक्ष में नीचे की ओर हैं ।
गीता श्लोक 15/02…
संसार वृक्ष……
भगवान कहते हैं कि उस संसार वृक्ष के गुणों, सत्व, रज और तम के द्वारा बढ़ी हुई तथा विषय रूप कोपल वाली शाखाएं नीचे, मध्य में और ऊपर, सब जगह फैली हुई हैं । मनुष्य लोक में कर्मों के अनुसार बांधने वाले मूल( जड़) भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रहे हैं ।
इस संसार वृक्ष की मुख्य शाखा अर्थात तना ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा से संपूर्ण देव, मनुष्य आदि योनियों की उत्पत्ति और विस्तार हुआ है । अतः ब्रह्मलोक से पाताल लोक तक जितने भी लोक तथा उनमें रहने वाले देव, मनुष्य, कीट, आदि प्राणी हैं, वे सभी संसार वृक्ष की शाखाएं हैं । जिस तरह जल सिंचन से वृक्ष की शाखाएं बढ़ती हैं, उसी प्रकार गुण, रूप जल के साथ से, इस संसार वृक्ष की शाखाएं बढ़ती हैं ।
जिस प्रकार शाखा से निकलने वाली नई कोंपल, पत्ती के डंठल से लेकर पत्ती के अग्रभाग तक को कोंपल कहा जाता है, उसी प्रकार गुणों की वृत्तियों से लेकर दृश्य पदार्थ को, इस श्लोक में विषय प्रवाल अर्थात विषयों की कोंपल कहा गया है ( विषयों को बढ़ाने वाला कहा गया है) । जिस प्रकार मूल से तना, तने से शाखाएं, शाखाओं से कोंपल, फटती हैं और कोपलों से शाखाएं आगे बढ़ती हैं, उसी प्रकार जल से विषय रूप कोंपले भी बढ़ती हैं ।
गीता श्लोक 15/03…..
संसार वृक्ष का स्वरूप…..
भगवान कहते हैं कि इस संसार वृक्ष का जैसा रूप देखने में आता है, वैसा यहां विचार करने पर नहीं मिलता है । क्योंकि इसका न तो आदि है और न अंत है और न स्थिति ही है । इसलिए इस दृढ़ मूल वाले संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष अर्थात पीपल वृक्ष को दृढ़ असंगत रूप शस्त्र के द्वारा काटकर……
इस संसार वृक्ष को अविनाशी कहा जाता है । भगवान कहते हैं कि विवेकवान पुरुष, बुद्धि से संसार से अलग होकर अर्थात संसार से संबंध विच्छेद कर करके देखने से उसका स्वरूप जैसा हमने मान रखा है, वैसा नहीं मिलता । यह तो नाशवान और दुख रूप प्रतीत होता है । संसार के आदि,अंत का पता लगाने के लिए जो साधन अर्थात इंद्रियां, मन और बुद्धि है । वह सब संसार के ही अंश हैं । अतः संसार से अलग होने पर ही संसार का स्वरूप ठीक-ठाक, अच्छी तरह से जाना जा सकता है । संसार तो एक उत्पत्ति और विनाश मात्र है । यहां पर प्रति क्षण उत्पत्ति और विनाश होता रहता है ।
गीता श्लोक 15/04………
मैं परमात्मा की ही शरण में हूं..
भगवान कहते हैं कि संसार वृक्ष छोड़ने के बाद, उस परम पद परमात्मा की खोज करनी चाहिए, जिसको प्राप्त हुए अर्थात प्राप्त होने पर, मनुष्य फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस अनादि काल से चली आने वाली यह सृष्टि विस्तार को प्राप्त हुई है, उस आदि पुरुष परमात्मा के ही में शरण में हूं ।
भगवान ने संसार से संबंध विच्छेद करने की बात कही है । अतः परमात्मा की खोज करने से पहले संसार से संबंध विच्छेद करना बहुत आवश्यक है । क्योंकि परमात्मा तो संपूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना पर स्थित में ज्यों के त्यों विद्यमान हैं । केवल संसार से अपना संबंध मानने के कारण ही नित्य प्राप्त परमात्मा के अनुभव में लग रहे हैं । संसार से संबंध बना रहने से परमात्मा की खोज करने में बाधा आती है । इसलिए साधक को पहले संसार से संबंध विच्छेद करने को ही प्रधानता अर्थात मुख्यता देनी चाहिए अर्थात संसार से संबंध विच्छेद कर लेना चाहिए ।
गीता श्लोक 15/05…
परम पद पाने वाले पुरुष ….
भगवान कहते हैं कि जो मान और मोह से रहित हो गए हैं, जिन्होंने आशक्ति से होने वाले दोषों को जीत लिया है, जो नित्य निरंतर परमात्मा में ही लगे हुए हैं, जो अपनी दृष्टि से संपूर्ण कामनाओं से रहित हो गए हैं, जो सुख-दुख नाम वाले बंधनों से मुक्त हो गए हैं, ऐसी ऊंची स्थित वाले मोह रहित साधक भक्त उस अविनाशी परम पद अर्थात् परमात्मा को प्राप्त होते हैं ।
भगवान कहते हैं कि शरीर में मैं और मेरापन होने से ही मन में आदर सत्कार की इच्छा होती है । जिन भक्तों का केवल भगवान में ही अपनापन होता है, उनका शरीर में मैं और मेरापन नहीं रहता । अतः वे शरीर के मान, आदर से प्रसन्न नहीं होते । एकमात्र भगवान के शरण होने पर उनका शरीर से मोह नहीं रहता । फिर मान आदर की इच्छा उनमें नहीं रहती । इसी प्रकार उनका संसार से मोह छूट जाता है । भगवान में आकर्षण होना प्रेम कहलाता है और संसार में आकर्षण होना मोह कहलाता है अर्थात आसक्ति कहलाता है । ममता, वासना,आशा आदि आशक्ति है । भगवान के पारायण होने पर सांसारिक भोगों की आसक्ति नहीं रहती । आसक्ति तो प्राप्त की और अब प्रति दोनों की होती है । परंतु कामना तो अप्राप्त की होती है ।
गीता श्लोक 15/04………
मैं परमात्मा की ही शरण में हूं..
भगवान कहते हैं कि संसार वृक्ष छोड़ने के बाद, उस परम पद परमात्मा की खोज करनी चाहिए, जिसको प्राप्त हुए अर्थात प्राप्त होने पर, मनुष्य फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस अनादि काल से चली आने वाली यह सृष्टि विस्तार को प्राप्त हुई है, उस आदि पुरुष परमात्मा के ही, मैं शरण में हूं ।
भगवान ने संसार से संबंध विच्छेद करने की बात कही है । अतः परमात्मा की खोज करने से पहले संसार से संबंध विच्छेद करना बहुत आवश्यक है । क्योंकि परमात्मा तो संपूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना पर स्थित में ज्यों के त्यों विद्यमान हैं । केवल संसार से अपना संबंध मानने के कारण ही नित्य प्राप्त परमात्मा के अनुभव में लग रहे हैं । संसार से संबंध बना रहने से परमात्मा की खोज करने में बाधा आती है । इसलिए साधक को पहले संसार से संबंध विच्छेद करने को ही प्रधानता अर्थात मुख्यता देनी चाहिए अर्थात संसार से संबंध विच्छेद कर लेना चाहिए ।
गीता श्लोक 15/05…
परम पद पाने वाले पुरुष ….
भगवान कहते हैं कि जो मान और मोह से रहित हो गए हैं, जिन्होंने आशक्ति से होने वाले दोषों को जीत लिया है, जो नित्य निरंतर परमात्मा में ही लगे हुए हैं, जो अपनी दृष्टि से संपूर्ण कामनाओं से रहित हो गए हैं, जो सुख-दुख नाम वाले बंधनों से मुक्त हो गए हैं, ऐसी ऊंची स्थित वाले मोह रहित साधक भक्त उस अविनाशी परम पद अर्थात् परमात्मा को प्राप्त होते हैं ।
भगवान कहते हैं कि शरीर में मैं और मेरापन होने से ही मन में आदर सत्कार की इच्छा होती है । जिन भक्तों का केवल भगवान में ही अपनापन होता है, उनका शरीर में मैं और मेरापन नहीं रहता । अतः वे शरीर के मान, आदर से प्रसन्न नहीं होते । एकमात्र भगवान के शरण होने पर उनका शरीर से मोह नहीं रहता । फिर मान आदर की इच्छा उनमें नहीं रहती । इसी प्रकार उनका संसार से मोह छूट जाता है । भगवान में आकर्षण होना प्रेम कहलाता है और संसार में आकर्षण होना मोह कहलाता है अर्थात आसक्ति कहलाता है । ममता, वासना,आशा आदि आशक्ति है । भगवान के पारायण होने पर सांसारिक भोगों की आसक्ति नहीं रहती । आसक्ति तो प्राप्त की और अब प्रति दोनों की होती है । परंतु कामना तो अप्राप्त की होती है ।





