स्वतंत्रता सेनानी महारानी अवंती बाई लोधी…..
मातृभूमि की माटी, हमको सदा_ सदा रही है प्यारी ।
कभी पहचान की मोहताज, रही न भारत की नारी ।।
आजादी के आंदोलन में, उनकी रही भूमिका भारी ।
इसी समय विद्रोह की नेता, थी रही अवंती नारी ।।
स्वतंत्रता का संग्राम रहा, विविध प्रसंगों का चक्र ।
स्त्री पुरुष संघर्ष में रत थे, समय रहा था वक्र ।।
भारत की भूमि पर जन्मी, गार्गी, मैत्री, अनुसुइया ।
लोपमुद्रा, सावित्रीबाई पधारी, और कुंती सी मैया ।।
मातृभूमि की बलिवेदी पर, तब चढ़ी बहुत सी नारी।
अवंतीबाई और पद्मिनी का, कहर रहा था भारी ।
दुर्गावती नहीं थी पीछे, अग्रगण्य रही लक्ष्मीबाई ।
काट काट दोनों ने गोरों को, भर दीं सारी खाई ।।
इन सबका उत्कृष्ट शौर्य, साहस और बलिदान ।
भुला नहीं सकते हैं हम, यह जाने सकल जहांन ।।
स्वतंत्रता का समर दौर हो, भले आज का काल ।
वीरांगनाओं के साहस ने, बुरा किया था हाल ।।
अवंतीबाई ने सोचा था, नहीं दासता स्वीकार करूंगी ।
रणभूमि में जाकर खुद ही, गोरों के प्राण हरूंगी ।।
कूद पड़ी अवंती रण में, मातृभूमि की रक्षा हेतु ।
उनकी अपनी सारी सेना, बनी रण दरिया का सेतु ।।
मातृभूमि की रक्षा में, अवंती ने प्राण गंवाए ।
ओजपूर्ण कर्तव्य रानी के, सबके मन को भाए ।।
कुर्बानी रानी की आज भी, सबको याद दिलाती ।
ओजपूर्ण कौशल की बातें, जन _जन को भाती ।।
के.सी. राजपूत, कोटा






