ग़ज़ल
शकूर अनवर
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जब तकब्बुर* के महल सब टूटकर रह जायेंगे।
फिर बचेगा क्या नज़र में बस खॅंडर रह जायेंगे।।
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पार जाना है जिन्हें वो कश्तियों को ठोंक लें।
डूबने के वास्ते हम बेहुनर रह जायेंगे।।
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हर क़दम पर साथ चलना वर्ना ऐसी भीड़ में।
तुम कहाँ खो जाओगे और हम किधर रह जायेंगे।।
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जब अना* टकरा गई तो बात क्या बन पायेगी।
बस कटाने के लिये जिस्मों पे सर रह जायेंगे।।
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अपनी बस्ती हादसों से हर तरह महफूज़ रख।
वर्ना सारे शहर में दो-चार घर रह जायेंगे।।
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पार दरिया के तुम्हें फ़िरओन* क्या ले जायेगा।
नाख़ुदा, कश्ती, मुसाफ़िर डूबकर रह जायेंगे।।
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खोल दे यारब दुआओं के लिये बाबे-क़ुबूल*।
वर्ना मेरे सारे सजदे बेअसर रह जायेंगे।।
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मत भरो “अनवर” मुहब्बत में कोई ऊॅंची उड़ान।
आतिशे-दिल*में झुलसकर बालो-पर* रह जायेंगे।।
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शकूर अनवर
तकब्बुर* ग़ुरूर,घमंड
अना*स्वाभिमान
फ़िरओन*मिश्र के ज़ालिम बादशाह का लक़ब
बाबे-क़ुबूल*दुआ या प्रार्थना स्वीकार होने का द्वार
आतिशे-दिल*प्रेम की अग्नि
बालो-पर* बाल और पंख
9460851271
ग़ज़ल -शकूर अनवर






