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प्रभु श्रीराम……..
(रचना के सी राजपूत, कोटा)
(प्रसंग श्री वाल्मीकि रामायण से)
एक बार नारद जी अपनी वीणा बजाते हुए वन में विहार कर रहे थे । तभी महर्षि वाल्मीकि जी को उनके आगमन की जानकारी प्राप्त हुई । तब श्री वाल्मीकि, ऋषि नारद जी से मिलने वहां पहुंचे …….
तब वाल्मीकि ऋषि आ गए, नारद जी के पास ।
हे ब्रह्म सुत मुझे बताइए, है मेरी यह आस ।।
कौन सा पुरुष श्रेष्ठ है? मुझे बताओ आप ।
सत्य वक्ता कौन है ? जो मन पर छोड़े छाप ।।
धर्मी उपकारी कौन है? प्रभु कहो सब सत्य ।
विचार करो एक पुरुष का, होगा सबको पथ्य ।।
जानता मैं एक पुरुष को, इक्ष्वाकु है उसका वंश ।
दशरथ प्रिय वह राम हैं, विष्णु के वह अंश ।।
कांतियुक्त वह बलशाली, तन है शोभा मान।
वक्षस्थल चौड़ा उनका, कंधे पर धरे कमान ।।
भौंहें मस्तक दोनों ऊंचे, कर में एक सराशन ।
अवध राज्य के राजा, ऊंचा है उनका आसन ।।
वे दशरथ पुत्र कहाते हैं,और कौशल्या हैं मैया ।
भरत, शत्रुघ्न भ्राता छोटे, अरु लक्ष्मण जैसे भैया ।
विश्व के कर्ताधर्ता वह, वे क्षमा रसा से सीखे ।
बनवासी जब हुए प्रभु, तब से बन में है दीखे ।।
शेष अगले दिन…….
: प्रभु श्रीराम …शेष भाग.. 2.
भरत राम से भेंट कर, फिर पहुंचे नंदीग्राम ।
प्रभु के पुनरागमन तक, बना लिया निज धाम ।।
भ्राता भार्या सहित प्रभु के, दर्शन पाए सरभंग ।
प्रभु मिलन थे कर रहे, सीता लक्ष्मण के सन्ग ।।
मुनि प्रार्थना कर रहे हैं, मारो सभी देवारि ।
मुनियों को दो अभय, सब रजनीचर मारि ।।
बात मान प्रभु राम ने, असुर गिराए मार ।
रावण भगिनी भी वहां, करने आई रार।।
तब मार गिराए सारे, त्रिसिरा खर और दूषण ।
तरकश और तीर थे, यही तो उनका भूषण ।।
तब जनस्थानी क्षेत्र में, दनुज मारे 14 हजार ।
की तंह पर श्री राम ने, प्रतिज्ञा अब की बार ।।
हे दस शीश राम से, क्यों करते हो जंग ।
परिणाम जानकर रण का, क्यों होते हो दंग ।।
लंकाधिपति माना नहीं, हुआ वंश का नास ।
काल के गाल में गया, बचा नहीं कुछ पास ।।
के. सी. राजपूत, कोटा।







