ग़ज़ल
शकूर अनवर
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न सिर्फ़ ज़ीस्त* की तल्ख़ी* ने बदहवास किया।
कभी कभी तेरी यादों ने भी उदास किया।।
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तुझे ग़ुरूर दिया तेरी कम-निगाही* ने।
मेरी नज़र ने तो मुझको वफ़ा-शनास* किया।।
कभी हुआ तेरी फ़ुर्क़त* में शेर कह डाले।
कभी रक़म* तेरी क़ुर्बत* पे इक़्तेबास* किया।।
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मुक़ाबले में तुझे चाॅंद से सिवा समझा।
मुबालग़े * में तुझे पाॅंच से पचास किया।।
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हुए तो हिज्र * में अपने ही बाल चाॅंदी हुए।
किया तो जिस्म को खुद हमने ही कपास किया।।
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बचाओ आबरू उर्दू की लुट न जाये कहीं।
ग़ज़ल के जिस्म को लोगों ने बेलिबास किया।।
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गुज़रना था रसनो-दार से गुज़र भी गये।
ये इम्तेहान भी “अनवर” हमीं ने पास किया।।
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शकूर अनवर
ज़ीस्त*जीवन
तल्ख़ी*कड़वाहट
कम निगाही*तंग नज़र
वफ़ा शनास*प्रेम से परिचित
फ़ुर्क़्त*जुदाई
रक़म करना*लिखना
क़ुरबत* सामीप्य,मिलन
इक़्तेबास*पैराग्राफ
मुबालग़े*अतिशयोक्ति
हिज्र*वियोग
रसनो-दार* सूली,फाॅंसी का फंदा
9460851271
ग़ज़ल -शकूर अनवर






