ग़ज़ल
शकूर अनवर
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जो भी शिकवा किया बेअसर ही रहा।
बेख़बर था सनम, बेख़बर ही रहा।।
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तुझसे मिलने के दिन भी मयस्सर हुए।
वो ज़माना मगर मुख़्तसर* ही रहा।।
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मौसमे-गुल* भी आया तो क्या फ़ायदा।
हसरतों का शजर बेसमर* ही रहा।।
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शग़्ले-शेरो-सुख़न* हमसे छूटा नहीं।
रोग इसका हमें उम्र भर ही रहा।।
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एक दिन मैं भी तुझसे भी बिछड़ जऊॅंगा।
ज़िंदगी भर मुझे इसका डर ही रहा।।
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इश्क़ के मरहलों* का सलीक़ा * न था।
इस हुनर में भी मैं बे हुनर ही रहा।।
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जिसने “अनवर” हमेशा सताया मुझे।
मेरी नज़रों में वो मोतबर* ही रहा।।
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शकूर अनवर
मयस्सर*यानी प्राप्त हुए
मुख़्तसर* यानी संक्षिप्त
मौसमे गुल*बसंत ऋतु
बे समर*फलों से वंचित
शग़्ले-शेरो-सुख़न*काव्यकर्म
मरहलों*पड़ावों
सलीक़ा *तमीज़,समझदारी
मौतबर*सम्मान योग्य
9460851271
ग़ज़ल- शकूर अनवर






