वह होलियां कुछ और थीं…
वह बोलियां कुछ और थीं, वह होलियां कुछ और थीं ।
रंग अबीर छिड़के गए खूब, वह रोलिया कुछ और थीं । ।
घर बुलाकर इष्ट मित्रों को, तब पीना पिलाना खूब था ।
मिलकर बैठते थे वह सहोदर, रंगों में डुबाना खूब था ।।
आई थी रंगों में बहार, वह अठखेलियां कुछ और थीं ।
वह बोलियां कुछ और थीं, वह होलियां कुछ और थीं ।।
दादा-दादी रखते थे हाथ, और सहलाते थे शिरों को ।
वह बहाते खूब थे आशीष,सभी नारी और नरों को ।
वरदान देते थे छकाकर, उनकी झोलियां कुछ और थीं ।
वह बोलियां कुछ और थीं, वह होलियां कुछ और थीं ।।
लग जाती थी होड़ पैर छूने की, दुआ की बाढ़ आती थी ।
जगह थी मुकम्मल बैठने की, वे चौपालें काम आती थीं ।
गुजिया पकवान भरे थाल, अबीर रोलियां कुछ और थीं ।
वह बोलियां कुछ और थीं, वह होलियां कुछ और थीं ।।
प्रातः दादी ताई के पैर छूना, एक होड़ का ही भाग था ।
दादा-दादी के समय में, खुशियों से भरा वह फाग था ।।
फेंकते थे घरों में रंग गुलाल, वह टोलियां कुछ और थीं ।
वह बोलियां कुछ और थीं, वह होलियां कुछ और थीं ।।






