Saturday, April 18, 2026
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वह होलियां कुछ और थीं…- कालीचरण राजपूत

वह होलियां कुछ और थीं…

 

वह बोलियां कुछ और थीं, वह होलियां कुछ और थीं ।

रंग अबीर छिड़के गए खूब, वह रोलिया कुछ और थीं । ।

घर बुलाकर इष्ट मित्रों को, तब पीना पिलाना खूब था ।

मिलकर बैठते थे वह सहोदर, रंगों में डुबाना खूब था ।।

 

आई थी रंगों में बहार, वह अठखेलियां कुछ और थीं ।

वह बोलियां कुछ और थीं, वह होलियां कुछ और थीं ।।

 

दादा-दादी रखते थे हाथ, और सहलाते थे शिरों को ।

वह बहाते खूब थे आशीष,सभी नारी और नरों को ।

वरदान देते थे छकाकर, उनकी झोलियां कुछ और थीं ।

वह बोलियां कुछ और थीं, वह होलियां कुछ और थीं ।।

 

लग जाती थी होड़ पैर छूने की, दुआ की बाढ़ आती थी ।

जगह थी मुकम्मल बैठने की, वे चौपालें काम आती थीं ।

गुजिया पकवान भरे थाल, अबीर रोलियां कुछ और थीं ।

वह बोलियां कुछ और थीं, वह होलियां कुछ और थीं ।।

 

प्रातः दादी ताई के पैर छूना, एक होड़ का ही भाग था ।

दादा-दादी के समय में, खुशियों से भरा वह फाग था ।।

 

फेंकते थे घरों में रंग गुलाल, वह टोलियां कुछ और थीं ।

वह बोलियां कुछ और थीं, वह होलियां कुछ और थीं ।।

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