ग़ज़ल
शकूर अनवर
उड़ानों के भॅंवर में थे।
परिंदे जो सफ़र में थे।।
*
ज़माने की नज़र में थे।
हमीं रक़्से-शरर में थे।।
*
यही था दिल का सरमाया*।
जो मोती चश्मे-तर* में थे।।
*
अचानक पड़ गया शबखूॅं*।
अभी हम रहगुज़र* में थे।।
*
फ़साने थे कई पिनहाॅं*।
कई क़िस्से खॅंडर में थे।।
*
किताबे-दिल हमीं से थी।
हमीं बाबे-दिगर* में थे।।
*
ये कैसी शहरदारी* थी।
सब अपने-अपने घर में थे।।
*
इसे कैसे ख़िज़ाँ समझूँ।
अभी पत्ते शजर में थे।।
*
कहाँ थे नाख़ुदा* “अनवर”।
सफ़ीने जब भॅंवर में थे।।
*
शकूर अनवर
रक़से-शरर*चिंगारियों का नृत्य
सरमाया*पूॅंजी
चश्मे-तर*भीगी हुई ऑंखें
शबखूॅं*रात के वक्त पड़ने वाला डाका
पिन्हाॅं*गुप्त
रहगुज़र*रास्ता
बाबे-दिगर*अन्य अध्याय
शहरदारी*आपसी संबंध
नाख़ुदा*माॅंझी,मल्लाह
*****†******************************
ग़ज़ल
शकूर अनवर
*
बहुत गहरे हैं उन ऑंखों के मंज़र।
कहीं देखे नहीं ऐसे समन्दर।।
*
चराग़ों से चराग़ों को जलाकर।
बना लो रोशनी का एक लश्कर*।।
कहाँ जायेंगे हम अपनों से कटकर।
रहेंगी मछलियाँ दरिया के अन्दर।।
*
ज़रा सी ज़िंदगी में सुख समेटो।
मिला है ओस को फूलों का बिस्तर।।
*
तुम्हारी नफ़रतें तुमको मुबारक।
तुम अपने पास रक्खो अपने ख़ंजर।।
*
तुम अपनी असलियत भी खो रहे हो।
मिलेगा क्या तुम्हें चेहरा बदल कर।।
*
कोई रोके ज़रा इस चाॅंदनी को।
कोई देखे सितारों को बुझाकर।।
*
बहा ले जायेगा सैलाब*”अनवर”।
न रक्खो आप इतना घर सजाकर।।
*🌹🌹🌹🌹🌹
शब्दार्थ:-
लश्कर*समूह,फौज
सैलाब*बाढ़
✍️शकूर अनवर
🌹9460851271






