ऋतुराज बसंत …..
बहि रही मंद सुगंध हवाएं, मलय पवन सभी को भाएं |
कोयल, पंख, पपीहे गायें, अपना भी किरदार निभाएं ||
है रहो ऊर्जा कौ संचार, आयो ऋतु बसंत कौ राज |
अब बदल रह्यौ व्यवहार, कलिका खिली खिली हैं आज ||
ऐसो आयो है ऋतुराज….
सजा लिया रथ ऋतु वसंत ने, पकड़ी राह अवनि की |
भ्रमण पर पंख पखेरू आए, अब देखें राह गमन की ||
दीख रहे हैं कोयल खंजन, अतिथि विदा हो रहे आज |
खुशियां छाइ रही हैं जगत में, खुल गए कुदरत के राज |
तरुओं पर पुष्पों का राज, ऐसो आयो है ऋतुराज …
होनी है अब शरद विदाई, नई कलियाँ कोंपल आईं |
बदल गई रंगत कुदरत की, खुशियां सब ओर ही छाई ||
दीख रही है नई सी वसुधा, सजा रही है यौवन कौ साज |
कदम बढ़ाए ऋतु बसंत ने, सज गया सामानो साज ||
घर में है सुगंध कौ राज, ऐसो आयो है ऋतुराज …
मदमाती ऋतु का प्रभाव यह, नित नई रंगत भाई है |
मानव मन आमोद भरा है, ऊर्जा नई नई आई है ||
तीखी सर्दी विदा हो रही, अब दिनकर खोलेंगे राज |
खुशियां हर मनमें छाई हैं, नियति सजा रही है साज ||
तरु पहनेंगे पुष्पों का ताज, ऐसो आयो है ऋतुराज ..
मौषम ने करवट बदली है, मुखर हुए पलास कदली हैं |
ऋतुएं जीवन का पर्याय, वे करती अदला बदली हैं ||
व्यवहार सुधारों सब जन, नियति बदल रही है आज |
सुरभि खोले कुदरत के राज, ऐसो आयो है ऋतुराज …
तरुओं में कोंपल आई हैं, कलियाँ सबके मन भाई हैं |
हो रहा जीवन में बदलाव, खुशियां चहुं ओर छाई हैं ||
सरस्वती की माया है, उन्हें ही पहनाओ ताज |
है रह्यो नवरस कौ आगाज, ऐसो आयो है ऋतुराज ..
के. सी. राजपूत, कोटा |





