Tuesday, April 21, 2026
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ग़ज़ल -शकूर अनवर 

ग़ज़ल

शकूर अनवर

*

आपस की बुराई नहीं फ़नकार* की बातें।

शायर हो करो “मीर” के अशआर की बातें।।

*

क्या समझें वो तूफ़ान की मॅंझधार की बातें।

इस पार से करते हैं जो उस पार की बातें।।

*

मक़तल* में मेरे ख़ूॅं का कहीं ज़िक्र न आया।

लोगों की ज़ुबाॅं पर रहीं तलवार की बातें।।

*

जब जब भी मिली तल्ख़ी ए हालात* से फ़ुर्सत।

याद आईं उसी शोख़ सितमगार की बातें।।

*

फ़रसूदा रिवायात* की तक़लीद* को छोड़ो।

बेसूद* हैं गिरती हुई दीवार की बातें।।

*

फिर आज मुख़ातिब* सरे- महफ़िल वही “अनवर”।

फिर आज सुनो शायरे- ख़ुद्दार की बातें।।

*

शब्दार्थ:-

फ़नकार*कलाकार

मक़तल*वधस्थल

तल्ख़ी ए हालात*समय की कड़वाहटें

रिवायतें*परंपराएँ

तक़लीद*अनुसरण

बेसूद*बेकार हानिकारक

मुख़ातिब*संबोधित

*

शकूर अनवर

9460851271

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