Sunday, August 30, 2026
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*नेत्र चिकित्सा की साइलेंट क्रांति एवं कैटरेक्ट सर्जरी का कायाकल्प* 

*नेत्र चिकित्सा की साइलेंट क्रांति एवं कैटरेक्ट सर्जरी का कायाकल्प*

 

वर्ष 1993, जब “खलनायक” फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचाया था। हर तरफ बस एक ही गाना गूंज रहा था, “चोली के पीछे क्या है।” बॉलीवुड के संजय दत्त अपनी काली पट्टी और एक आंख ढंके, फिल्म में कुछ ऐसे झूम रहे थे जैसे वह किसी सीक्रेट मिशन पर हों। लेकिन उनकी आँखों की पट्टी को देखकर हमारे दिमाग में एक और तस्वीर उभरती है—1990 के दशक की कैटरेक्ट सर्जरी के बाद मरीज़ों की हालत!

 

वर्ष 1990s के दशक में बड़े चीरे टांके लगाकर की जाने वाली कैटरेक्ट सर्जरी के बाद मरीज़ों को एक हरी पट्टी पहनाई जाती थी और हिदायतों की लंबी लिस्ट का पालन करने को कहा जाता था. जैसे —”मोतियाबिन्द ऑपरेशन के बाद लगभग दो माह तक घरों में कम प्रकाश या अँधेरे में रहना, न अधिक झुकना, न टी.वी. देखना, न किताब पढ़ना, और हां, एक से डेढ़ माह नहाने से बचना!” बेचारे मोतियाबिन्द की सर्जरी करवा चुके मरीज़ इस डर में रहते थे कि अगर आँखों में कुछ इन्फेक्शन आदि हो गया …. आँख की रोशनी चली गई तो…. वे फिर से परिजनों एवं चिकित्सक के सम्मुख “खलनायक” बन जायेंगे. रोगियों को यह भी डर अनवरत सताता था कि खलनायक फिल्म में दिखाए किरदार संजय दत्त की आँखों पर लगी काली पट्टी की तरह उनकी दुनिया में हमेशा के लिये अँधेरा नहीं छा जाए। इतना ही नहीं उस समय “आई कैम्प” में ऑपरेशन करने के बाद मास इन्फेक्शन (Endophthalmitis) जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं होने पर ऑपरेटिंग नेत्र चिकित्सक को खलनायक बनाकर प्रकाशित किए गए समाचार भी हमने पढ़े हैं.

 

शायद यही कारण था कि 1990 के उस दौर में अधिकांश मोतियाबिन्द रोगी दिखाई देना बंद होने पर ही मोतियाबिन्द ऑपरेशन कराने नेत्र चिकित्सक के पास पहुंचते थे. ऑपरेशन के बाद कम रोशनी लौटने एवं अनेकानेक जटिलताओं के उस दौर में नेत्र चिकित्सक भी “अभी आपका मोतियाबिंद पूरी तरह से पका नहीं है” कहकर रोगियों का मोतियाबिन्द पकने पर ही ऑपरेशन की सलाह देने में नहीं हिचकिचाते थे.

 

*नेत्र चिकित्सा जगत की साइलेंट क्रांति: हरी पट्टी से हाई-टेक लेंस तक मोतियाबिंद सर्जरी का अनोखा सफर:*

 

नेत्र चिकित्सा जगत में सर हेरोल्ड रिडली एवं डॉ चार्ल्स केलमैन के क्रान्तिकारी खोज के बाद फिर आया छोटे से चीरे से की जाने वाली फेकोइमल्सिफिकेशन और इंट्राओक्युलर लेंस (IOL) का दौर। हरी पट्टी और पुराने लंबे परहेजो का अंत होने लगा। नेत्र चिकित्सा जगत में कैटरेक्ट सर्जरी का रिफ्रेक्टिव कैटरैक्ट सर्जरी के रूप में समूचा काया कल्प हुआ. अत्याधुनिक फेको तकनीक एवं प्रीमियम लैंस से सुसज्जित कैटरेक्ट सर्जरी डे-केयर प्रक्रिया बन गई। मरीज़ मोतियाबिन्द सर्जरी के बाद सीधा घर जा सकता है…. और आँखों के डॉक्टर की हिदायतें भी बदल गईं—”ऑपरेशन बहुत अच्छा हो गया, लैंस लग गया है, सात दिन सिर के नीचे से नहाना है, अब आप अख़बार पढ़ सकते हैं, टी.वी. देख सकते हैं, मोबाइल का उपयोग कर सकते हैं।” प्रीमियम (Multifocal, Trifocal and EDOF ) कृत्रिम लेंस के बाद अब चश्में पर भी निर्भरता कम से कम होती जा रही है.

 

यह नेत्र चिकित्सा विज्ञान की साइलेंट क्रांति है, जो करोड़ों मोतियाबिन्द रोगियों को विश्वभर में नया प्रकाश दे रही है…

 

डॉ सुरेश पाण्डेय, डॉ विदुषी शर्मा,

सुवि नेत्र चिकित्सालय, कोटा

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