हिंदी अर राजस्थानी भासा का i साहित्यकार, केंद्रीय साहित्य अकादमी का बाल पुरस्कार सूं सम्मानित आदरजोग सी.एल. सांखला साहब कै द्वारा रची पोथी – ‘ऐतरेयोपनिषद को काव्यानुवाद’ अनुसिरजण की लै’ण मं एक महताऊ काम छै। यो भावानुवाद पढ़’र या बात समझी जा सकै छै कै अनुवाद कै द्वारा मूल कृति की आत्मा कै तांईं कस्यां अक्षुण्ण राख्यो जा सकै छै। लेखक को मानबो छै कै सिरजण ब्रह्मा जी कै जस्यो काम छै तो अनुसिरजण बुनकर कै जस्यो। लेखक का मन मं बचपन सूंईं ये सवाल हळोळा लेता र्या कै संसारी को रचाव क्यूं अर कस्यां होयो ? अस्या सवाल ज्यांको जवाब रिसी,मुनी, जोगी-जती, तपसी अर साधक बी नं जाण सक्या। लेखक कै तांईं यां संदांई अणसुळज्या सवालां को जवाब ऐतरेयोपनिषद की पोथी मं मल्यो, तो ईं पोथी की विचारणा कै तांईं स्हैज-सरल भासा मं जगती कै सामै लाबा को जतन सरु कर्यो। ईं जतन को परिणाम ईं छै कै ऐतरेयोपनिषद को राजस्थानी काव्यानुवाद आज आपणा हाथां मं छै। लेखक कै तांईं ईं उपनिसद मं जीव-जगत, आत्मा- परमात्मा सूं जुड़्या घणा अणसुळज्या सवालां को जवाब मल्यो छै। सबसूं महताऊ बात या छै कै ईं पोथी की विचारणा प्रकृति अर विज्ञान कै नजीक छै।
अनुवाद कठण काम छै। दो भासान् की तात्विक जाणकारी होयां सूं ही यो सधै छै। फैर उपनिषद जस्या ग्रंथां की भासा अर विचारणा ईं समझबो आसान कोइनै; तो बी यो अनुसिरजण घणोई महताऊ छै। मूळ भाव अर कथन की सुरक्सा खातर ईं मं केई सब्द वै का वैई मूळ रूप मं प्रयोग कर्या छै, जस्यां प्रज्ञान,ब्रह्म, परमात्म, रंध्र,अंडज,जरायुज,परम तत्व आद आद। ज्ये यां की जगै दूजा सब्द काम ल्या जाता तो मूळ भाव बगड़ सकै छो,ऊं ई बचाबा लेखै मूळ सब्दां को प्रयोग बी उचित ही छै।
जगती का कण-कण मं परम तत्व का दरसण होवै छै। स्रस्टि की उत्पत्ति अर जीव -जगत सूं जुड़्या अणसुळज्या सवालां को जवाब खोजबा की पैहल आदमकाल सूं ईं चाल री छै। परमात्मा की खोज मनखजूण की एक जातरा छै। जे आगै बी चालती रैहगी। ईं पोथी को पहलो खंड आत्मा -परमात्मा नै जाणबा कै लेखै अर दूजो खंड देवगणां कै तांईं जाणबा कै लेखै उल्लेखजोग छै।तीजा खंड मं भूख,तस अर तृप्ति का बारा मं जाणकारी छै। उदाहरण सरूप –
“कण-कण का रूप दरसबाळा,
जे जीव-जीव ईं जगती मं।
कोई कौनै छा तत्ववान,
छो आत्म तत्व ई जगती मं।।”
प्रकृति -पुरुष का संजोग सूं स्रस्टि आगै कस्यां बढ़ी –
“यूं प्रकृति पुरुस की संगत सूं,
होया छा सहस जीवधारी।
मण सूं कण-कण हो पसरी छी,
यूं परम तत्व की संसारी।।”
पांच तत्वां का संजोग सूं कस्यां देहधारी स्रस्टि को सरजण होयो ईं बात कै तांईं परगट करबाळा श्लोकां को भावानुवाद प्रसंसाजोग छै-
“वाचा अग्नि बण मुंडां मं,
अर प्राण बायरो नाकां मं।
काना मं दसूं दिसा दसगी,
दरसण सूरज का आख्यां मं।।”
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“सब जड़ी रूखड़्यां चाम बणी,
चंदरमो मन-सो हिवडा़ मं।
टूंडी मं मौत अपान बसी,
जळ रळग्यो संदा लिंगां मं।।”
परमात्मा नै ईं स्रस्टि को रूप कस्यां, क्हां सूं अर किण विधान सूं संवार्यो?श्लोक को भावानुवाद देखो-
“अपणा तप सूं परमातम नै,
जळ सूं उपजायो एक रूप।
जगती मं अन्न हुयो जीं सूं,
संवर्यो स्रस्टि को यूं सरूप।।”
ऐतरेयोपनिषद मं परमात्मा नै जीवधार्यां की देह को पोसण करबा को तरीको बी बतायो छै अर लारां ईं यां बात बी बताई छै कै वूं पोसण कस्यां अर क्हां सूं मलैगो ? जीव काया सूं ईं संसारी नै नं चला सकैगो ईं लेखै परमात्मा खुद आत्मा का रूप मं जीवधारी कै लारां रै छै –
“म्हारै बिन रहलै पिंड कस्यां,
म्हारो होबो बी जरूरी छै,
परमात्म बच्यारी बात अस्यां,
म्हारो रैहबो बी जरूरी छै।।”
परमात्म छेद खोपड़ी नै,
यूं ब्रह्म रंध्र कै भीतर ग्यो।
छो यो उजास आणंददायी,
ज्ये कंठ नैण हिवडै़ बसग्यो।।
आत्मा को सरूप कांईं छै, आत्मा को निवास क्हां छै ? यां सवालां को जवाब यो छै कै देह मं आत्मा का रूप मं ईं परमात्मा को बासो छै। आत्मा -परमात्मा एक ई छै।चर-अचर, उद्भिज,अंडज,जरायुज सब्या मं आत्मा को बासो छै। जस्यांन-
“छै ब्रह्म इंद्र अर प्रजापत,
प्रज्ञान रूप या आत्मा ईं।
याई देवी या ई देवता छै,
अर पांच भूत आत्मा ईं।।
उगबाळी पौध पसीनों या,
अंडज बी और जरायुज बी।
हाथी घोड़ा अर बैल गऊ,
या आत्मा ईं छै मानुस बी।।”
‘ऐतरेयोपनिषद राजस्थानी काव्यानुवाद’ की पोथी जीवन-जगत,जीव -आत्मा अर स्रस्टि की उत्पत्ति का बारा मं सनातनी चिंतन अर रिस्यां मुन्यां का विचार जाणबा कै लेखै एक महताऊ पोथी साबित होवैगी। आपको अस्यो सिरजण आगे बी पढ़बा मं मिलतो रैहगो।असी आसा कै लारां आदरजो सी.एल.साहब कै तांईं घणी घणी बधाइयां।
पोथी को नांव- ऐतरेयोपनिषद
(राजस्थानी काव्यानुवाद)
लेखक – सी.एल.सांखला
प्रकाशक -आनंद प्रकाशन, दादाबाड़ी, कोटा, राजस्थान
प्रकाशन वर्ष -2024
कीमत -70/रु.
योगेश यथार्थ
अध्यक्ष
करसो खेत खलांण,ग्रामीण साहित्य एवं संस्कृति संवर्द्धन समिति ढोटी, शाखा -सरकन्या जिला -बारां (राज.)
9928547927





हिंदी अर राजस्थानी भासा का i साहित्यकार, केंद्रीय साहित्य अकादमी का बाल पुरस्कार सूं सम्मानित आदरजोग सी.एल. सांखला साहब कै द्वारा रची पोथी – ‘ऐतरेयोपनिषद को काव्यानुवाद’ अनुसिरजण की लै’ण मं एक महताऊ काम छै। यो भावानुवाद पढ़’र या बात समझी जा सकै छै कै अनुवाद कै द्वारा मूल कृति की आत्मा कै तांईं कस्यां अक्षुण्ण राख्यो जा सकै छै। लेखक को मानबो छै कै सिरजण ब्रह्मा जी कै जस्यो काम छै तो अनुसिरजण बुनकर कै जस्यो। लेखक का मन मं बचपन सूंईं ये सवाल हळोळा लेता र्या कै संसारी को रचाव क्यूं अर कस्यां होयो ? अस्या सवाल ज्यांको जवाब रिसी,मुनी, जोगी-जती, तपसी अर साधक बी नं जाण सक्या। लेखक कै तांईं यां संदांई अणसुळज्या सवालां को जवाब ऐतरेयोपनिषद की पोथी मं मल्यो, तो ईं पोथी की विचारणा कै तांईं स्हैज-सरल भासा मं जगती कै सामै लाबा को जतन सरु कर्यो। ईं जतन को परिणाम ईं छै कै ऐतरेयोपनिषद को राजस्थानी काव्यानुवाद आज आपणा हाथां मं छै। लेखक कै तांईं ईं उपनिसद मं जीव-जगत, आत्मा- परमात्मा सूं जुड़्या घणा अणसुळज्या सवालां को जवाब मल्यो छै। सबसूं महताऊ बात या छै कै ईं पोथी की विचारणा प्रकृति अर विज्ञान कै नजीक छै।
