*†***** ग़ज़ल*******
शकूर अनवर
मियाँ जाते रहोगे सायबाॅं* से।
शिकायत कर रहे हो आसमाॅं से।।
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दिखाई दे रहा है जो खॅंडर सा।
कोई आवाज़ देता है वहाँ से।।
यहाँ तो सर कटाने का चलन है।
न होगा कुछ तेरी आहो-फ़ुग़ाॅं* से।।
ये उक़्दा* खुल भी जाये मौत का अब।
ये पर्दा उठ भी जाये दरमियाँ से।।
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किसी का दिल कभी तुम मत दुखाना।
ये हमने बात सीखी अपनी “माँ” से।।
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मुहब्बत की कोई मंज़िल नहीं है।
मुहब्बत में फ़क़त जाते हैं जाॅं से।।
अचानक जल गया घर मेरा “अनवर”।
अचानक बिजलियाँ आईं कहाँ से।।
”
शब्दार्थ:-
सायबाॅं*छप्पर
आहो फ़ुगाॅं*विलाप करना,रोना धोना
उक़्दा*भेद, राज़
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शकूर अनवर
9460851271
*†******ग़ज़ल*****
शकूर अनवर
हम तने-तन्हा* चले थे, क़ाफ़िला कोई न था।
मंज़िलें दुशवार” थीं और रास्ता कोई न था।।
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ज़िंदगी की राह में दोनों बहुत मजबूर थे।
दोनों इतना जानते थे बेवफ़ा कोई न था।।
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उस गली की आरज़ू दिल से निकलती ही नहीं।
जिस गली की सम्त* मेरा रास्ता कोई न था।।
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एक उसका साथ था और रास्ते की मुश्किलें।
हादसे ही हादसे* थे दूसरा कोई न था।।
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तुझसे थी तनक़ीद* मेरी, तुझसे ही था तब्सिरा*।
कहने वाला मुझको अच्छा या बुरा कोई न था।।
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हम जिये “अनवर” कुछ ऐसे,दूरियां बढ़ती गईं।
वर्ना अपने दरमियाँ भी फ़ासला कोई न था।।
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शब्दार्थ:तने-तन्हा*अकेले
दुशवार*कठिन
सम्त*तरफ,दिशा
हादसे*दुर्घटनाएं
तनक़ीद*आलोचना
तब्सिरा*विवेचना
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शकूर अनवर
9460851271





