Wednesday, April 22, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर 

*†***** ग़ज़ल*******

शकूर अनवर

 

मियाँ जाते रहोगे सायबाॅं* से।

शिकायत कर रहे हो आसमाॅं से।।

*

दिखाई दे रहा है जो खॅंडर सा।

कोई आवाज़ देता है वहाँ से।।

 

यहाँ तो सर कटाने का चलन है।

न होगा कुछ तेरी आहो-फ़ुग़ाॅं* से।।

 

ये उक़्दा* खुल भी जाये मौत का अब।

ये पर्दा उठ भी जाये दरमियाँ से।।

*

किसी का दिल कभी तुम मत दुखाना।

ये हमने बात सीखी अपनी “माँ” से।।

*

मुहब्बत की कोई मंज़िल नहीं है।

मुहब्बत में फ़क़त जाते हैं जाॅं से।।

 

अचानक जल गया घर मेरा “अनवर”।

अचानक बिजलियाँ आईं कहाँ से।।

शब्दार्थ:-

सायबाॅं*छप्पर

आहो फ़ुगाॅं*विलाप करना,रोना धोना

उक़्दा*भेद, राज़

*

शकूर अनवर

9460851271

*†******ग़ज़ल*****

शकूर अनवर

 

हम तने-तन्हा* चले थे, क़ाफ़िला कोई न था।

मंज़िलें दुशवार” थीं और रास्ता कोई न था।।

*

ज़िंदगी की राह में दोनों बहुत मजबूर थे।

दोनों इतना जानते थे बेवफ़ा कोई न था।।

*

उस गली की आरज़ू दिल से निकलती ही नहीं।

जिस गली की सम्त* मेरा रास्ता कोई न था।।

*

एक उसका साथ था और रास्ते की मुश्किलें।

हादसे ही हादसे* थे दूसरा कोई न था।।

*

तुझसे थी तनक़ीद* मेरी, तुझसे ही था तब्सिरा*।

कहने वाला मुझको अच्छा या बुरा कोई न था।।

*

हम जिये “अनवर” कुछ ऐसे,दूरियां बढ़ती गईं।

वर्ना अपने दरमियाँ भी फ़ासला कोई न था।।

*

शब्दार्थ:तने-तन्हा*अकेले

दुशवार*कठिन

सम्त*तरफ,दिशा

हादसे*दुर्घटनाएं

तनक़ीद*आलोचना

तब्सिरा*विवेचना

*

शकूर अनवर

9460851271

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