24 कैरेट असली सोने के वर्क, प्राकृतिक रंगों और हस्तनिर्मित बसली पर उकेरी गई ऐतिहासिक परंपरा
चित्रकार शंभू सिंह चौबदार✍️
राजस्थान की पारंपरिक चित्रकला शैलियों में बूंदी शैली का विशेष स्थान है। इस शैली में बनी चित्रकृतियां राजसी वैभव, तत्कालीन जीवनशैली, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती हैं। इसी कला परंपरा का सुंदर उदाहरण है बूंदी शैली में चित्रित ‘चंवरदारनी’ नायिका, जो राजदरबारों और धार्मिक परंपराओं में सेविकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाती है।
राजदरबारों में चंवर ढुलाने की परंपरा
राजा-महाराजाओं के समय राजमहलों में विभिन्न प्रकार के सेवक और सेविकाएं नियुक्त होती थीं, जिनकी अलग-अलग जिम्मेदारियां होती थीं। इनमें चंवर ढुलाने की सेवा भी महत्वपूर्ण मानी जाती थी। चंवर ढुलाना राजपरिवार के सम्मान, प्रतिष्ठा और राजसी गरिमा का प्रतीक था। इसके साथ ही चंवर का उपयोग मक्खियों और अन्य कीटों से बचाव के लिए भी किया जाता था।
धार्मिक परंपराओं में भी चंवर सेवा का विशेष महत्व है। विशेष रूप से ठाकुरजी की सेवा में चंवर ढुलाना श्रद्धा, समर्पण और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। बूंदी शैली की यह नायिका तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था और सेवा परंपराओं की झलक प्रस्तुत करती है।
चित्रशाला की भित्तिचित्र परंपरा की अनुकृति
इस चित्रकृति का मूल आधार बूंदी की प्रसिद्ध चित्रशाला में दीवार पर बना भित्तिचित्र है। उसी ऐतिहासिक कलाकृति से प्रेरित होकर इसकी अनुकृति तैयार की गई है। चित्र में पारंपरिक वेशभूषा, आभूषणों की बारीकियों और नायिका की भाव-भंगिमा के माध्यम से बूंदी शैली की विशिष्ट कलात्मक विशेषताओं को उभारने का प्रयास किया गया है।
24 कैरेट सोने के वर्क से निखरा राजसी सौंदर्य
इस पेंटिंग की प्रमुख विशेषता इसमें किया गया बारीक स्वर्ण कार्य है। नायिका के आभूषणों को आकर्षक और राजसी स्वरूप देने के लिए 24 कैरेट असली सोने के वर्क का प्रयोग किया गया है। आभूषणों पर सोने के वर्क को बेहद बारीकी से लगाया गया है, जिससे चित्रकृति में पारंपरिक वैभव और सूक्ष्म कलात्मकता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
चित्र निर्माण में देशी एवं प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया गया है। इसके साथ ही हस्तनिर्मित ‘बसली’ का प्रयोग हुआ है। बसली पारंपरिक चित्रकला में उपयोग होने वाला ऐसा आधार है, जिसे यहां तीन कागजों को आपस में चिपकाकर तैयार किया गया है। यह पारंपरिक निर्माण पद्धति चित्रकला की प्राचीन तकनीकों और शिल्प कौशल को दर्शाती है।
जयपुर में राज्य स्तरीय प्रदर्शनी में प्रदर्शित
बूंदी शैली की यह चंवरदारनी नायिका चित्रकृति जयपुर में आयोजित राज्य स्तरीय प्रदर्शनी में भी प्रदर्शित हो चुकी है। यह उपलब्धि हाड़ौती की पारंपरिक चित्रकला और उसकी समृद्ध विरासत को व्यापक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर रही।
हाड़ौती की कला विरासत का जीवंत दस्तावेज
बूंदी शैली की चंवरदारनी नायिका केवल एक चित्र नहीं, बल्कि राजसी परंपराओं, धार्मिक आस्था, सामाजिक जीवन और पारंपरिक शिल्प कौशल का कलात्मक दस्तावेज है। प्राकृतिक रंगों, हस्तनिर्मित बसली और असली सोने के वर्क के संयोजन से तैयार यह कलाकृति बूंदी की ऐतिहासिक चित्रकला परंपरा की बारीकियों को सामने लाती है।
ऐसी चित्रकृतियां हाड़ौती की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को राजस्थान की समृद्ध कला विरासत से परिचित कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।






