21वीं सदी में क्यों जरूरी है संतुलित पैरेंटिंग?
लेखक : परमानन्द गोयल, कोटा (राजस्थान)
सख्ती ने हमें अनुशासित बनाया पर उदास भी किया, अब बच्चों को आजाद बचपन देकर मानसिक रूप से मजबूत बनाना होगा
“तुम ऐसे पेरेंट्स के घर कैसे पैदा हो गए, जो अपने स्कूल में काफी ब्रिलियंट थे?”
शाम को 6 बजे ऑफिस से होमवर्क देखने के लिए भागकर घर आने वाले हर माता-पिता ने कभी न कभी गुस्से में यह ताना जरूर मारा है। घर पहुंचकर जब बच्चा टीवी देखते हुए मिलता है, तो दिन भर का फ्रस्ट्रेशन पूरे घर में फैल जाता है।
क्या यह दृश्य आपके घर का भी है? अगर हाँ, तो आप अकेले नहीं हैं। और यहीं से 21वीं सदी की पैरेंटिंग की सबसे बड़ी चुनौती शुरू होती है।
एक सहमी हुई ‘संस्कारी बच्ची’ की कहानी
दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक कहानी ने मुझे झकझोर दिया। ख्यात लेखिका एलिसिस डी लीवर का बचपन इसी सख्ती में बीता – ‘बच्चे सिर्फ दिखने चाहिए, उनकी आवाज सुनाई नहीं देनी चाहिए।’ बाहर से उन्हें हमेशा ‘संस्कारी बच्ची’ का तमगा मिला, पर भीतर एक सहमी हुई लड़की थी जिसे लगता था कि प्यार पाने की एक ही शर्त है – शांत रहो और हर बात सिर झुकाकर मानो। गलती करने के डर और भावनाएं दबाने की आदत ने उन्हें भीतर से हमेशा उदास रखा।
बड़ी होकर उन्होंने इस चक्रव्यूह को तोड़ने का फैसला किया। उन्होंने तय किया कि उनके बच्चे बिना झिझक सवाल पूछेंगे, असहज होने पर खुलकर ‘ना’ कहेंगे और बिना डरे अपनी बात रखेंगे।
जेन एक्स (1965-1980) तक तो घर-घर की यही कहानी थी। इसमें पेरेंट्स को भी दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उन परिस्थितियों में शायद यही उचित था।
हम गुस्सा क्यों हो जाते हैं? – मैनेजमेंट गुरु की नजर से
मैनेजमेंट गुरु एन. रघुरामन अपने कॉलम ‘मैनेजमेंट फंडा’ में इसी गुस्से की जड़ बताते हैं। हम गुस्सा इसलिए करते हैं क्योंकि हम अपनी तुलना बच्चों से करते हैं।
हम खुद सेल्फ-मोटिवेटेड स्टूडेंट थे, हमारा दिन 24 घंटे का था। पर हम भूल जाते हैं कि हमारे बचपन में अनवरत डिजिटल स्टिम्युलेशन, सोशल मीडिया, स्मार्टफोन और ऑनलाइन गेमिंग जैसी ध्यान भटकाने वाली अंतहीन चीजें नहीं थीं, जो आज युवाओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। उन पर एकेडमिक प्रेशर भी कहीं ज्यादा है।
रघुरामन एक बहुत जरूरी वैज्ञानिक सच बताते हैं – इंडिपेंडेंट लर्निंग, प्लानिंग, टाइम मैनेजमेंट, फ्रस्ट्रेशन-टॉलरेंस और टास्क शुरू करने की क्षमता धीरे-धीरे विकसित होती है। कुछ लोगों में तो यह 30 की उम्र के बाद आती है। इसलिए आपका बच्चा आलसी या लापरवाह नहीं, बल्कि ‘लेट-लर्नर’ हो सकता है।
तो संतुलित पैरेंटिंग है क्या?
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की बाल मनोवैज्ञानिक डॉ. जेनिफर एपस्टीन कहती हैं, “बैलेंस्ड पैरेंटिंग का अर्थ है जरूरत से ज्यादा सख्ती और बहुत ज्यादा छूट के बीच का संतुलन। इसमें माता-पिता बच्चों की भावनाओं को मान्यता देते हैं, साथ ही स्पष्ट सीमाएं भी तय करते हैं।”
सीमा और सहानुभूति का यही संगम बच्चे में भावनात्मक लचीलापन, आत्मनिर्भरता और सही-गलत का विवेक पैदा करता है।
एलिसिस ने इसे कैसे किया? जब बच्चे रात में रोते तो वे डांटती नहीं, गले लगा लेतीं। कहानियां बार-बार सुनातीं, पूरा ध्यान बच्चों पर देतीं। उन्होंने बच्चों को महसूस कराया कि प्यार किसी शर्त पर नहीं, हर हाल में मिलेगा। और सबसे बड़ा बदलाव – अगर गुस्से में उनसे खुद कोई गलती हो जाती, तो वे बच्चों से माफी मांगने में भी नहीं हिचकती थीं।
गुस्सा रोकने का फंडा
रघुरामन की कहानी इस लेख को पूरा करती है। वे यूके के ऑक्सफोर्ड ग्रेजुएट मैथ्यू डोनली का उदाहरण देते हैं, जो ग्रेजुएशन के बाद 6 यूरो फीस पर बिग-मैक डिलीवरी कर 125 यूरो रोज कमा रहा है, क्योंकि उस साल यूके में ग्रेजुएट्स के लिए सिर्फ 8383 वैकेंसी थीं, जबकि 2017 में 55800 थीं। वह ऑक्सफोर्ड के छात्रों को भी खाना पहुंचाता है, पर कभी जताता नहीं कि वह उनसे ज्यादा एजुकेटेड है।
यह कहानी हमारे बच्चों को दो बातें सिखाती है – पहला, डिग्री से बड़ा है काम का सम्मान और दूसरा, जब बच्चा उल्टा जवाब दे या इनकार करे तो वह दिखावटी बहादुरी नहीं, बल्कि ‘इमोशनल सेल्फ-प्रोटेक्शन’ है। वह खुद को कमतर महसूस करने से बचा रहा है।
फंडा यह है कि जब बच्चे कोई काम करने से इनकार करें, आलसी दिखें या उल्टा जवाब दें तो यह समझने की कोशिश करें कि उनकी बात लड़कपन की दिखावटी बहादुरी है या इमोशनल सेल्फ-प्रोटेक्शन। एक बार आप इसे समझ जाएंगे तो आपका गुस्सा कम होने लगेगा।
21वीं सदी में हमें रोबोट नहीं, इंसान चाहिए। ऐसा इंसान जो सवाल पूछ सके, ‘ना’ कह सके और गलती करके सीख सके। और यह सिर्फ संतुलित पैरेंटिंग से ही संभव है।






