मोदी का वैश्विक नेतृत्व, ओम बिरला का संसदीय कूटनीतिक संवाद: ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम से दुनिया को भारत का लोकतांत्रिक संदेश
✍️ डॉ. नयन प्रकाश गांधी-पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति केवल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक पहचान विविधताओं के बीच संवाद, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना में भी निहित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत वैश्विक मंचों पर अपनी विकास संबंधी प्राथमिकताओं, रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय सहयोग को प्रमुखता से रख रहा है।
इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की अंतरराष्ट्रीय संसदीय सहभागिता भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं और संसदीय संवाद को वैश्विक समुदाय के समक्ष प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।26 और 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में प्रस्तावित 12वां ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान आयोजित यह मंच सदस्य देशों की संसदों के बीच संवाद, अनुभवों के आदान-प्रदान और साझा चुनौतियों पर विचार-विमर्श का अवसर प्रदान करता है। यह केवल संसदीय प्रतिनिधियों की बैठक नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका, संस्थागत सहयोग और लोकतांत्रिक संवाद की संभावनाओं पर विचार करने का अवसर भी है।

➡️ वैश्विक नेतृत्व और संसदीय कूटनीति का समन्वय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में विकास, तकनीकी नवाचार, जलवायु संबंधी चुनौतियों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं को प्रमुखता से उठाया है। ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंच भारत को इन विषयों पर अन्य सदस्य देशों के साथ विचार-विमर्श करने का अवसर देते हैं।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कार्यपालिका और विधायिका की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। प्रधानमंत्री और सरकार जहां विदेश नीति तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग की व्यापक दिशा तय करते हैं, वहीं संसदों के बीच संवाद विधायी अनुभवों, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और जनहित से जुड़े मुद्दों पर सहयोग को प्रोत्साहित कर सकता है। इसी कारण संसदीय कूटनीति को औपचारिक राजनयिक संबंधों का विकल्प नहीं, बल्कि उनका एक उपयोगी पूरक माना जाता है।लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की भूमिका इसी संसदीय आयाम से जुड़ी है। अंतरराष्ट्रीय संसदीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए संसदीय संस्थाओं के बीच संवाद, लोकतांत्रिक परंपराओं के आदान-प्रदान और सहयोग की संभावनाओं को आगे बढ़ाना इस भूमिका का महत्वपूर्ण पक्ष है।

➡️ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम : साझा चुनौतियों पर साझा विमर्श
ब्रिक्स मूलतः उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण मंच है। समय के साथ इसका दायरा आर्थिक सहयोग से आगे बढ़कर विकास, प्रौद्योगिकी, वित्तीय सहभागिता, ऊर्जा, जलवायु और वैश्विक शासन से जुड़े विषयों तक विस्तृत हुआ है। इसकी संसदीय प्रक्रिया सदस्य देशों के विधायी प्रतिनिधियों को इन प्राथमिकताओं के लोकतांत्रिक और नीतिगत पक्षों पर चर्चा करने का अवसर देती है।नई दिल्ली में प्रस्तावित 12वें ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम का महत्व इस बात में है कि इसमें सदस्य देशों के सांसद और संसदीय प्रतिनिधि अपने-अपने देशों के अनुभवों, चुनौतियों और नीतिगत दृष्टिकोणों को साझा कर सकते हैं। ऐसे विमर्श से यह समझ विकसित हो सकती है कि विकासशील देशों के सामने समान समस्याओं के समाधान के लिए किस प्रकार की नीतियां, संस्थागत व्यवस्थाएं और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं।विशेष रूप से डिजिटल परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, युवाओं के लिए रोजगार, महिला सशक्तीकरण, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा तथा सतत विकास जैसे विषय संसदीय चर्चा के लिए प्रासंगिक हैं। इन क्षेत्रों में तकनीकी प्रगति के साथ-साथ कानून, जवाबदेही, समावेशिता और नागरिकों के अधिकारों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

डॉ. नयन प्रकाश गांधी-पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक





