Thursday, October 8, 2026
as jewellers
previous arrow
next arrow

Top 5 This Week

Related Posts

पुण्य का अंतिम फल अरिहंत पद और मोक्ष होना चाहिए : मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज

पाप की निर्जरा को लक्ष्य बनाकर करें धार्मिक क्रिया

पुण्य का अंतिम फल अरिहंत पद और मोक्ष होना चाहिए : मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज

कोटा। बुधवार, आश्विन कृष्ण द्वादशी के अवसर पर श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, दादाबाड़ी नसियां जी, कोटा में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री 108 प्रणवसागर जी महाराज ने कहा कि धार्मिक क्रियाओं का उद्देश्य केवल पुण्य अर्जित करना नहीं, बल्कि पाप कर्मों का बंध रोकना, संवर करना और कर्मों की निर्जरा करना होना चाहिए। साधक जब पाप कर्मों के क्षय को अपनी साधना का मुख्य लक्ष्य बनाता है, तब उसका पुण्य भी सातिशय पुण्य के रूप में परिणत होता है।

मुनिश्री ने कहा कि सातिशय पुण्य करते-करते यदि साधक प्रमाद अथवा मद-कषाय में पड़ जाए तो उसका पुण्य निरतिशय पुण्य की दिशा में जा सकता है। इसलिए प्रत्येक धार्मिक क्रिया के पीछे शुद्ध भावना और आत्मकल्याण का लक्ष्य होना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि हमें प्रत्येक धार्मिक क्रिया इस भावना के साथ करनी चाहिए कि हमारे अनंत कर्मों का क्षय हो। जब गुरु महाराज हमारे घर आहार के लिए पधारें तो केवल पुण्य प्राप्ति की भावना न रखते हुए यह भाव होना चाहिए कि मेरे अनंत कर्मों की निर्जरा कराने के लिए गुरुवर मेरे घर पधारे हैं। ऐसी भावना साधक के पुण्य को विशेषता प्रदान करती है। मान-कषाय आदि के कारण प्राप्त होने वाला पुण्य भी यदि सम्यक भावना के साथ किया जाए तो वह आत्मकल्याण की दिशा में सहायक बन सकता है।

मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि हमारा लक्ष्य केवल पुण्य कमाना नहीं, बल्कि पाप को छोड़ना, पाप कर्मों का नाश करना और कर्मों की निर्जरा करना होना चाहिए। “पुण्यफला अरिहंता” अर्थात पुण्य का सर्वोच्च फल अरिहंत पद और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होना चाहिए। यदि हमारा पुण्य हमें संसार के सुखों में ही बांधे रखता है और आत्मकल्याण की दिशा में आगे नहीं बढ़ाता, तो उस पुण्य की सार्थकता अधूरी रह जाती है।

पात्रता के विषय में मुनिश्री ने कहा कि पुण्य के कार्य में पात्र की विशेष भूमिका होती है। पात्र मुख्यतः तीन प्रकार के माने गए हैं—उत्तम पात्र, मध्यम पात्र और जघन्य पात्र। साधक को अपनी श्रद्धा, भावना और पात्रता को उत्तम बनाते हुए ऐसे पुण्य का अर्जन करना चाहिए, जो पाप कर्मों के बंध को रोकने तथा कर्मों की निर्जरा में सहायक बने।

उन्होंने कहा कि पुण्य का संचय आत्मकल्याण की दिशा में उपयोगी है। केवलज्ञान की प्राप्ति के समय अनंत जन्मों में संचित पुण्य भी निमित्त बनता है। लेकिन पुण्य के भोग के साथ यदि विवेक नहीं है तो नए पाप कर्मों का बंध भी हो सकता है। इसलिए साधक को पुण्य के फल और पाप के फल—दोनों को पहचानना आवश्यक है।

मुनिश्री ने कहा कि जब तक पुण्य का उदय रहता है, तब तक जीवन में अनेक सुविधाएं और अवसर सहज रूप से प्राप्त होते रहते हैं, किंतु इस पुण्य का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। पाप से बचने का पुरुषार्थ किया जाए तो पुण्य की प्राप्ति स्वतः होती है। इसलिए धार्मिक क्रियाओं में बाहरी प्रदर्शन से अधिक अपनी आंतरिक परिणति को महत्व देना चाहिए।

उन्होंने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि अपने समय का सदुपयोग करें, पाप कर्मों से बचें और ऐसे पुण्य का अर्जन करें, जो आत्मा को अरिहंत-सिद्ध पद की ओर ले जाए। आत्मा में परिवर्तन अचानक नहीं आता, बल्कि धीरे-धीरे होता है। निरंतर पुरुषार्थ, संयम और सद्भावना से किया गया प्रयास एक दिन अवश्य सार्थक होता है।

मुनिश्री ने कहा कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य संसार में पुण्य के सुखों को प्राप्त करना मात्र नहीं, बल्कि पाप से निवृत्ति, कर्मों की निर्जरा और अंततः अरिहंत-सिद्ध अवस्था की प्राप्ति है। इसी लक्ष्य को सामने रखकर किया गया प्रत्येक धार्मिक पुरुषार्थ आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से किया पुण्यार्जन

प्रशासनिक मंत्री  अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री एवं विभिन्न श्रद्धालु परिवारों द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया। कलश स्थापना का पुण्यार्जन भी श्रद्धालु परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

सुमित सेंकी एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेंद्र , हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार; चन्दन माला, अक्षय एवं नेहा बबरिया (संधारा वाले) परिवार; तथा सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।

धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धालुओं द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ उपवास के माध्यम से प्राप्त किया गया।

श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमती कलावती जी एवं श्री अभय जी जैसवाल परिवार को उपवास के माध्यम से प्राप्त हुआ।

इस अवसर पर मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी हर्षा कोटिया द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

गुरुवाणी का अमृत संदेश

आज के प्रवचन का सार

आत्मबल, दृढ़ता और धर्म में अटूट श्रद्धा ही साधक को कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाती है। परिस्थितियां कैसी भी हों, व्रत, नियम और संयम से विचलित नहीं होना चाहिए। इच्छाओं और कामनाओं का त्याग निष्पृहता को जन्म देता है, निष्पृहता से वैराग्य और वैराग्य से आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त होता है। सम्यक ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह सम्यक चारित्र के रूप में जीवन में दिखाई दे। गुरु से प्राप्त ज्ञान को आचरण में उतारकर, श्रद्धा, विवेक और पुरुषार्थ के साथ आगे बढ़ना ही आत्मकल्याण की सच्ची दिशा है।

Screenshot_2026-10-05-18-54-50-53_c0d35d5c8ea536686f7fb1c9f2f8f274
previous arrow
next arrow

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles