लेखक : परमानन्द गोयल ✍️कोटा (राजस्थान)
एक समय था जब कॉलेज की डिग्री को सुरक्षित भविष्य और पक्की नौकरी का सबसे बड़ा पासपोर्ट माना जाता था। अभिभावकों का सपना होता था कि बेटा-बेटी अच्छी डिग्री और अच्छे अंकों के साथ पढ़ाई पूरी करें और सम्मानजनक नौकरी हासिल करें। लेकिन समय बदल रहा है। आज रोजगार की दुनिया में केवल यह नहीं पूछा जाता कि युवा के पास कौन-सी डिग्री है और उसने कितने प्रतिशत अंक हासिल किए हैं, बल्कि सवाल तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है—“उसे वास्तव में आता क्या है?”
यही बदलती सोच नए भारत की पहचान बन रही है।
डिग्री ज्ञान की बुनियाद है और व्यक्ति की शैक्षणिक यात्रा तथा विषयगत समझ को प्रमाणित करती है। लेकिन आज के प्रतिस्पर्धी दौर में केवल किताबी ज्ञान पर्याप्त नहीं है। तकनीकी दक्षता, समस्या-समाधान, प्रभावी संवाद, नेतृत्व, टीम के साथ काम करने की क्षमता, व्यावहारिक समझ और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की योग्यता भी जरूरी है।
परीक्षा के अंक किसी विद्यार्थी की पूरी प्रतिभा का अंतिम प्रमाण नहीं होते। अनेक लोगों ने सामान्य शैक्षणिक प्रदर्शन के बावजूद अपनी स्किल, मेहनत, अनुभव, रचनात्मक सोच और नेतृत्व क्षमता के बल पर बड़े मुकाम हासिल किए हैं। दूसरी ओर, अच्छी डिग्री और शानदार अंक होने के बावजूद व्यावहारिक कौशल का अभाव रोजगार के बाजार में चुनौती बन सकता है।
इसका अर्थ डिग्री का महत्व समाप्त होना नहीं है। डिग्री अवसर के दरवाजे खोल सकती है, लेकिन उस अवसर को सफलता में बदलने के लिए कौशल, मेहनत, सीखने की निरंतर इच्छा और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता जरूरी है। डिग्री बताती है कि आपने क्या पढ़ा है, जबकि स्किल बताती है कि आप क्या कर सकते हैं।
नीति आयोग की रिपोर्ट का संकेत
विकसित भारत@2047 के लक्ष्य की दिशा में कौशल विकास को महत्वपूर्ण मानते हुए नीति आयोग ने अगस्त 2026 में ‘Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047’ रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट शिक्षा, कौशल और आजीविका के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता को रेखांकित करती है। इसमें लगभग 8.7 करोड़ युवाओं के ऐसे वर्ग का उल्लेख है जो न रोजगार में हैं, न शिक्षा में और न ही प्रशिक्षण से जुड़े हैं।
यह आंकड़ा सीधे बेरोजगारी का पर्याय नहीं है, लेकिन यह अवश्य बताता है कि बड़ी संख्या में युवाओं को शिक्षा, कौशल और आजीविका के प्रभावी रास्तों से जोड़ने की आवश्यकता है। रिपोर्ट में व्यावहारिक अनुभव, कार्यस्थल से जुड़ाव, रोजगार-तैयारी और उद्यमिता के अवसर बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।
यही वह क्षेत्र है, जहां डिग्री के साथ स्किल का महत्व सामने आता है।
किताबी ज्ञान से व्यावहारिक दक्षता तक
आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन, डिजिटल तकनीक और बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था ने काम की प्रकृति तेजी से बदल दी है। जो तकनीक आज नई है, संभव है कुछ वर्षों बाद सामान्य हो जाए और उसके स्थान पर कोई नई तकनीक आ जाए। ऐसे में डिग्री को करियर की मंजिल नहीं, बल्कि सीखने की शुरुआत मानना होगा।
उद्योगों को ऐसे युवा चाहिए जो डिजिटल प्लेटफॉर्म समझें, डेटा का उपयोग कर सकें, नई तकनीक सीखें और वास्तविक समस्याओं का व्यावहारिक समाधान निकाल सकें। इसलिए आने वाले समय में “डिग्री + स्किल” का संयोजन केवल डिग्री की तुलना में अधिक प्रभावी होगा।
स्किल का अर्थ केवल कंप्यूटर या मशीन चलाना नहीं है। संवाद कौशल, टीमवर्क, समय प्रबंधन, नेतृत्व, रचनात्मकता, वित्तीय समझ, उद्यमिता और समस्या-समाधान भी महत्वपूर्ण स्किल हैं।
नौकरी मांगने से नौकरी देने तक
नई पीढ़ी की सोच में एक और बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। युवा अब केवल नौकरी पाने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि रोजगार पैदा करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं।
स्टार्टअप, ई-कॉमर्स, डिजिटल सेवाएं, एग्री-बिजनेस, फूड प्रोसेसिंग, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन, मैन्युफैक्चरिंग और ग्लोबल ट्रेड जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा हो रहे हैं। इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने छोटे शहरों और कस्बों के युवाओं को भी देश और दुनिया के बाजार से जुड़ने का अवसर दिया है।
एक सफल उद्यमी केवल अपने लिए रोजगार नहीं बनाता, बल्कि अनेक लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करता है। यही सोच आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत की आर्थिक नींव को मजबूत कर सकती है।
नितिन गडकरी और उनके बेटे का उदाहरण
इसी बदलाव को समझने के लिए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा सार्वजनिक रूप से बताए गए उनके बेटे के व्यवसाय का उदाहरण उल्लेखनीय है। नागपुर में एग्रीकॉस वेलनेस सोसाइटी के एक कार्यक्रम में गडकरी ने अपने बेटे के कारोबार और कृषि-आधारित व्यवसायों से जुड़े अवसरों का उल्लेख किया था। समाचार पत्रों में प्रकाशित उनके बयान के अनुसार, मेरे पास पैसों की कमी नहीं , हर महीने 200 करोड़ कमाता हूँ ।उन्होंने बताया कि उनका बेटा आयात-निर्यात के क्षेत्र में स्वतंत्र व्यवसाय करता है और वे उसे मुख्य रूप से नए विचार और आइडिया देते हैं।
गडकरी के बताए उदाहरणों के अनुसार, उनके बेटे ने ईरान से सेब मंगाने तथा भारत से केले निर्यात करने का कारोबार किया। उन्होंने गोवा की मछली विदेश भेजने, ऑस्ट्रेलिया में मिल्क पाउडर से जुड़ी फैक्ट्री लगाने तथा अबूधाबी और अन्य स्थानों पर कंटेनर भेजने का भी उल्लेख किया। इसके अलावा आईटीसी के साथ मिलकर 26 चावल मिलें चलाने की बात भी कही गई।
इस उदाहरण को केवल एक व्यवसाय की कहानी के रूप में नहीं, बल्कि विचार से अवसर और अवसर से रोजगार तक की यात्रा के रूप में देखना चाहिए।
यहां तीन बातें विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं।
पहली—पढ़ाई के साथ व्यवसायिक कौशल। बाजार को समझना, ग्राहक की जरूरत पहचानना, आयात-निर्यात, लॉजिस्टिक्स, प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन का व्यावहारिक ज्ञान आधुनिक व्यवसाय की महत्वपूर्ण स्किल हैं।
दूसरी—आइडिया से कमाई। नया विचार बड़ी पूंजी है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है उसे जमीन पर उतारने की क्षमता। किसी समस्या को अवसर और अवसर को व्यवसाय में बदलना ही उद्यमिता की असली पहचान है।
तीसरी—व्यवसाय का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव। कृषि उत्पादों का व्यापार, खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात केवल व्यापारी की कमाई तक सीमित नहीं रहते। इससे किसान, परिवहन, पैकेजिंग, श्रमिक और स्थानीय उद्योगों को भी काम मिलता है। यही नौकरी मांगने से नौकरी पैदा करने की दिशा है।
बदलनी होगी सोच
अनेक परिवार आज भी सफलता का सबसे बड़ा पैमाना डिग्री और अंक को मानते हैं। लेकिन हर बच्चे की प्रतिभा अलग होती है। कोई इंजीनियर या डॉक्टर बनना चाहता है तो कोई तकनीशियन, डिजाइनर, शेफ, इलेक्ट्रिशियन, ड्रोन ऑपरेटर, डिजिटल मार्केटिंग विशेषज्ञ, किसान-उद्यमी या कुशल कारीगर बन सकता है।
इसलिए बच्चों से केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है—“तुम कितने अंक लाए?”
हमें यह भी पूछना होगा—“तुम्हें क्या करना अच्छा लगता है?” और “तुम कौन-सा काम सबसे अच्छी तरह कर सकते हो?”
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी व्यावसायिक शिक्षा, कौशल विकास और अनुभवात्मक शिक्षण पर जोर दिया गया है। अब आवश्यकता है कि इन विचारों को कक्षा और किताबों से निकालकर वास्तविक जीवन और कार्यस्थल से जोड़ा जाए। स्कूल स्तर से ही बच्चों को करके सीखने, समस्या-समाधान, तकनीक, संवाद, नेतृत्व और उद्यमिता के अवसर मिलने चाहिए।
सरकार, शिक्षण संस्थान, उद्योग और परिवार—सभी को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहां स्किल को डिग्री से कमतर न माना जाए। युवाओं को भी समझना होगा कि अपस्किलिंग और री-स्किलिंग अब विकल्प नहीं, आवश्यकता हैं।
विकसित भारत की असली ताकत
विकसित भारत केवल डिग्रीधारियों की संख्या बढ़ाने से नहीं बनेगा। भारत को ऐसे युवा चाहिए जिनके पास ज्ञान भी हो, कौशल भी हो और उस कौशल को जमीन पर उतारने का साहस भी हो।
आज जरूरत डिग्री छोड़ने की नहीं, बल्कि डिग्री को स्किल से जोड़ने की है। शिक्षा और कौशल का यह मेल युवाओं को रोजगार योग्य बनाएगा, उद्यमिता को बढ़ावा देगा और भारत की आर्थिक शक्ति को नई ऊंचाई देगा।
आने वाला भारत वह होगा जहां सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होगा कि “आपने क्या पढ़ा?”, बल्कि यह भी होगा कि “आपने जो पढ़ा, उससे क्या कर सकते हैं?”
डिग्री दिशा दे सकती है, स्किल गति दे सकती है और अनुभव मंजिल तक पहुंचा सकता है।
यही है—डिग्री से स्किल की ओर बढ़ते नए भारत की असली पहचान।






