‘मेरा-तेरा’ का भाव छोड़ें, समस्त जीवों के कल्याण की भावना ही वास्तविक धर्म
कोटा/ श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में विराजमान निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि यदि मनुष्य वास्तविक सुख और शांति प्राप्त करना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपनी आत्मा को शांत करना होगा। जहां आत्मिक शांति होती है, वहां शारीरिक शांति स्वतः प्राप्त हो जाती है। बाहरी साधन केवल शरीर को आराम दे सकते हैं, किंतु आत्मा की शांति केवल धर्म, श्रद्धा और समर्पण से ही संभव है।
उन्होंने कहा कि धर्म कोई विकल्प नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत सत्य है। जो व्यक्ति धर्म की शरण में जाता है, वही वास्तविक सुख, शांति और आत्मकल्याण का अनुभव करता है। इसके लिए भगवान, गुरु और धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास आवश्यक है। जब तक मन में संदेह रहेगा, तब तक आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं हो सकती।
मुनिश्री ने कहा कि संदेह मोक्षमार्ग का सबसे बड़ा शत्रु है। एक बार जब गुरु को स्वीकार कर लिया जाए, तब उनके प्रति किसी प्रकार का संशय नहीं रखना चाहिए। समर्पण के बिना न साधना सफल होती है और न ही आत्मकल्याण संभव है।
उन्होंने कहा कि अध्यात्म का वास्तविक अर्थ संसार को जानना नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानना है। आज मनुष्य दूसरों को समझने और उनके दोष देखने में लगा है, किंतु स्वयं के भीतर झांकने का समय नहीं निकाल पा रहा। जब तक आत्मचिंतन नहीं होगा, तब तक जीवन में वास्तविक परिवर्तन भी संभव नहीं होगा।
मुनिश्री ने कहा कि धन, वैभव और संपत्ति को लोग कल्याण का साधन मान लेते हैं, जबकि वास्तविक कल्याण धर्म से होता है। यदि कोई व्यक्ति अपार धन-संपत्ति का स्वामी हो, किंतु उसका मन अशांत और शरीर रोगग्रस्त हो, तो वह वैभव भी उसके किसी काम नहीं आता। वास्तव में दुःख का कारण धन का अभाव नहीं, बल्कि लालसा, आसक्ति और अनियंत्रित इच्छाएं हैं।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव में अनंत शक्तियां विद्यमान हैं। स्वाध्याय, पुरुषार्थ और अटूट श्रद्धा से ये शक्तियां जागृत होती हैं। इसलिए संदेह का त्याग कर भगवान के प्रति पूर्ण समर्पित होना चाहिए। केवल विश्वास की बातें करने से नहीं, बल्कि अपने आचरण से विश्वास को सिद्ध करना चाहिए।
‘मेरा’ नहीं, ‘सबका’ भाव रखें
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि पूजा-अर्चना करते समय अधिकांश लोग केवल अपने और अपने परिवार के सुख की कामना करते हैं, जबकि धर्म हमें ‘मम’ (मेरा) से ऊपर उठकर ‘हम’ की भावना अपनाना सिखाता है। जब शांतिधारा में हम समस्त जीवों के मंगल और कल्याण की भावना रखते हैं, तब उसमें हमारा कल्याण भी स्वतः समाहित हो जाता है। इसलिए भगवान के समक्ष केवल अपने लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के मंगल की भावना रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जहां स्वार्थ समाप्त होता है, वहीं से धर्म प्रारंभ होता है। ‘मेरा-तेरा’ का भाव ही संसार के बंधनों का कारण है। वास्तविक ज्ञानी वही है, जिसका हृदय उदार हो और जो संपूर्ण पृथ्वी को अपना परिवार मानकर चले। यही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का वास्तविक स्वरूप है।
समर्पण से ही जीवन बनता है पावन
मुनिश्री ने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल धन, पद और प्रतिष्ठा अर्जित करना नहीं, बल्कि अपनी आत्मा को निर्मल एवं पवित्र बनाना है। सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति की कामना अमांगलिक है, जबकि आत्मा की निर्मलता ही वास्तविक मांगलिकता है। समर्पण का अर्थ है—सम्यक रूप से स्वयं को निस्वार्थ भाव से धर्म और गुरु के चरणों में अर्पित कर देना।
भगवान हमसे दूर नहीं, हम भगवान से दूर हो रहे हैं
उन्होंने कहा कि भगवान कभी हमसे दूर नहीं होते, बल्कि हमारे भीतर का संदेह, अहंकार और आसक्ति हमें भगवान से दूर कर देते हैं। यदि मन में समर्पण का अभाव है, तो समझना चाहिए कि श्रद्धा अभी पूर्ण नहीं हुई है। इसलिए पूजा, साधना और भक्ति में ‘मैं’ (अहंकार) तथा ‘मेरा’ (आसक्ति) का भाव समाप्त करना आवश्यक है।
आत्मकल्याण का मार्ग दिखाने कोटा पधारे हैं गुरुवर
क्षुल्लक संयम सागर जी महाराज ने कहा कि कोटा के जैन समाज ने जिस श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ गुरुवर का मंगल प्रवेश कराया, वह अत्यंत अद्भुत एवं अविस्मरणीय है। अब उसी श्रद्धा के साथ उनके ज्ञान, ध्यान और अध्यात्म का अधिकाधिक लाभ भी लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि गुरुवर किसी से कुछ लेने नहीं, बल्कि प्रत्येक आत्मा को आत्मकल्याण का मार्ग दिखाने आए हैं। ऐसे महान संतों का सान्निध्य अत्यंत दुर्लभ होता है। कोटा नगर वास्तव में पुण्यशाली है। स्वयं गुरुवर ने भी कहा है कि यहां के पुण्यात्माओं के शुभ पुण्यों ने उन्हें पुनः कोटा आने के लिए प्रेरित किया। इसलिए प्रत्येक श्रद्धालु को इस दुर्लभ अवसर का पूर्ण लाभ उठाकर अपने जीवन को धर्ममय, पावन और सार्थक बनाना चाहिए।
आज से प्रारंभ होगा सिद्धचक्र महामंडल विधान
मुख्य संयोजक धर्मचंद धनोप्या एवं अर्चना (रानी) जैन सर्राफ ने बताया कि मंगलवार से पुण्योदय नसियां जी में मुनि श्री के पावन सान्निध्य में आठ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ होगा। प्रातः ध्वजारोहण के साथ विधान प्रारंभ होगा तथा मुख्य पात्रों का चयन भी किया जाएगा। आयोजन समिति द्वारा सभी व्यवस्थाएं पूर्ण कर ली गई हैं। उन्होंने समस्त श्रद्धालुओं से अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त करने का आग्रह किया।
आज के पुण्यार्जक
समिति अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ एवं महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेन्द्र हरसोरा, श्रीमती पुष्पा बाई बागड़िया, योगेश धीरावत (बांसवाड़ा) तथा श्रीमती सुशीला जी एवं l विवेक ठोरा परिवार द्वारा किया गया। नेमिनाथ भगवान का निर्माण लाडू चढ़ाकर बड़े धूमधाम से निर्माण उत्सव मनाया गया
निदेशक हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि आज के श्रावक श्रेष्ठी बनने का पुण्यार्जन श्रीमती सुशीला एवं विवेक ठोरा परिवार द्वारा प्राप्त किया गया, जबकि शास्त्र भेंट का सौभाग्य रामरतन आर.के. पुरम परिवार को प्राप्त हुआ।
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गुरुवाणी के प्रमुख संदेश
🔸 आत्मिक शांति ही जीवन का आधार — जहां आत्मिक शांति होती है, वहां शारीरिक शांति स्वतः प्राप्त हो जाती है।
🔸 धर्म कोई विकल्प नहीं — धर्म ही जीवन का वास्तविक मार्ग है। धर्म की शरण लेने वाला ही स्थायी सुख और शांति प्राप्त करता है।
🔸 संदेह छोड़िए, समर्पण अपनाइए — संदेह मोक्षमार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। श्रद्धा और समर्पण से ही आत्मकल्याण संभव है।
🔸 गुरु पर अटूट विश्वास रखें — जिस प्रकार पुत्र को अपने पिता पर विश्वास होता है, उसी प्रकार गुरु पर भी पूर्ण श्रद्धा रखें।
🔸 स्वयं को जानना ही अध्यात्म है — दूसरों के दोष देखने के स्थान पर स्वयं को पहचानें और अपना आत्मपरिष्कार करें।
🔸 धर्म से होता है वास्तविक कल्याण — धन नहीं, धर्म मनुष्य को स्थायी सुख, शांति और कल्याण प्रदान करता है।
🔸 आसक्ति ही दुःख का मूल कारण है — लालसा, मोह और ‘मेरा’ का भाव ही जीवन के समस्त दुःखों की जड़ है।
🔸 समस्त जीवों के मंगल की भावना रखें — केवल अपने लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के कल्याण की भावना ही सच्चा धर्म है।







