मयूर सोनी-✍️
आज का दौर डिजिटल संचार का दौर है। लगभग हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्टफोन है और लगभग हर परिवार, संस्था, व्यापारिक संगठन, सामाजिक समिति, स्कूल, कॉलेज, मोहल्ला और मित्र मंडली का अपना-अपना व्हाट्सएप ग्रुप है। एक समय था जब लोग मिलने पर हालचाल पूछते थे, आज एक संदेश से सैकड़ों लोगों तक बात पहुंच जाती है। यह तकनीक की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।
लेकिन हर सुविधा के साथ जिम्मेदारी भी आती है। पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि अधिकांश व्हाट्सएप ग्रुप सूचना के मंच से अधिक संदेशों की भीड़ का माध्यम बनते जा रहे हैं। सुबह से रात तक “सुप्रभात”, “शुभरात्रि”, धार्मिक संदेश, राजनीतिक विचार, बिना पुष्टि वाली खबरें, वीडियो, फॉरवर्ड और व्यक्तिगत प्रचार की इतनी अधिक भरमार हो जाती है कि वास्तव में महत्वपूर्ण संदेश भी इस भीड़ में दब जाते हैं।
जब जरूरी संदेश भी नजरअंदाज होने लगें
कई बार किसी संस्था का महत्वपूर्ण कार्यक्रम, किसी मरीज के लिए रक्तदान की अपील, किसी छात्र की सफलता, किसी सामाजिक अभियान की सूचना या किसी आपात स्थिति का संदेश ग्रुप में भेजा जाता है, लेकिन लगातार आने वाले अन्य संदेशों के कारण वह लोगों की नजर से ओझल हो जाता है। कई सदस्य इतने अधिक संदेशों से परेशान होकर ग्रुप को “म्यूट” कर देते हैं या पढ़ना ही बंद कर देते हैं।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या हमारा उद्देश्य संवाद करना है या केवल संदेश भेजते रहना?
हर संदेश भेजने से पहले एक प्रश्न
किसी भी संदेश को भेजने से पहले स्वयं से कुछ प्रश्न पूछना चाहिए—
– क्या यह संदेश वास्तव में सभी सदस्यों के लिए उपयोगी है?
– क्या इसकी जानकारी सत्यापित है?
– क्या इसे भेजना आवश्यक है?
– क्या इससे किसी व्यक्ति, समाज या संस्था को लाभ होगा?
– क्या यह किसी की भावनाओं को आहत तो नहीं करेगा?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक है, तभी संदेश साझा करना अधिक उचित होगा।
सूचना और अफवाह में अंतर समझें
आज सोशल मीडिया पर सबसे बड़ी चुनौती फर्जी सूचनाएं हैं। कई लोग बिना जांचे-परखे किसी भी खबर, वीडियो या फोटो को आगे भेज देते हैं। बाद में वही संदेश अफवाह बनकर समाज में भ्रम, तनाव और विवाद का कारण बन जाता है।
जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है कि किसी भी सूचना को उसकी सत्यता जांचे बिना आगे न बढ़ाए।
ग्रुप एडमिन की भी महत्वपूर्ण भूमिका
किसी भी व्हाट्सएप ग्रुप का एडमिन केवल सदस्य जोड़ने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह उस समूह की डिजिटल संस्कृति का संरक्षक भी होता है। यदि ग्रुप के स्पष्ट नियम हों—जैसे केवल विषय से संबंधित संदेश, फर्जी खबरों पर रोक, व्यक्तिगत प्रचार सीमित रखना और एक-दूसरे का सम्मान करना—तो समूह अधिक उपयोगी बन सकता है।
डिजिटल शिष्टाचार भी जरूरी
जिस प्रकार आमने-सामने बातचीत के कुछ सामाजिक नियम होते हैं, उसी प्रकार डिजिटल दुनिया में भी शिष्टाचार होना चाहिए। किसी की निजी तस्वीर बिना अनुमति साझा न करें, अनावश्यक रूप से बार-बार संदेश न भेजें, देर रात संदेश भेजने से बचें और दूसरों की निजता का सम्मान करें।
तकनीक का सही उपयोग ही उसकी सफलता है
व्हाट्सएप ने समाज को जोड़ने का काम किया है। परिवार दूर रहकर भी जुड़े हैं, व्यापार आसान हुआ है, सामाजिक संस्थाओं का संचालन सरल हुआ है और जरूरतमंदों तक सहायता तेजी से पहुंची है। लेकिन यदि यही माध्यम अनियंत्रित संदेशों का अड्डा बन जाए तो उसका उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
निष्कर्ष
व्हाट्सएप ग्रुप हमारी सुविधा के लिए बने हैं, समय नष्ट करने या अनावश्यक संदेशों की प्रतियोगिता के लिए नहीं। यदि प्रत्येक सदस्य यह संकल्प ले कि वह केवल उपयोगी, सत्य और समाजहित की जानकारी ही साझा करेगा, तो हर ग्रुप ज्ञान, सहयोग और सकारात्मक संवाद का प्रभावी मंच बन सकता है।
आइए, हम सभी डिजिटल नागरिक होने का दायित्व निभाएं। संदेशों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता बढ़ाएं। क्योंकि एक सार्थक संदेश सैकड़ों अनावश्यक संदेशों से कहीं अधिक प्रभाव छोड़ता है।
“सोच-समझकर भेजा गया एक संदेश समाज को जोड़ सकता है, जबकि बिना सोचे भेजा गया एक संदेश समाज को तोड़ भी सकता है।”





