कोटा/कांग्रेस पिछले एक दशक से भय, भ्रम, झूठ और अराजकता आधारित राजनीति करती दिखाई देती है। उसके अधिकांश राजनीतिक अभियानों और आंदोलनों का उद्देश्य किसी समस्या का स्थायी समाधान प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों में असंतोष, आशंका और अविश्वास का वातावरण निर्मित करना रहा है। राहुल गांधी का कोटा छात्र संवाद कार्यक्रम भी इसी राजनीतिक क्रम की एक कड़ी था।
निर्दोष कोटा के प्रति क्या दुर्भावना है ?
कोटा कई दसक से देश भर के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण तरीके से परीक्षाओं की तैयारी का केंद्र रहा है। पेपरलीक प्रकरणों में कोटा का नाम कभी नहीं आया। हॉल के नीट पेपरलीक में भी दूसरे स्थानों के नाम आये , किन्तु कोटा का कहीं भी कोई नाम नहीं था। फ़िर भी कांग्रेस और राहुल गाँधी नें कोटा क्यों चुना, यह स्वयं ही प्रश्न खड़ा करता है। वे कोटा के प्रति अविश्वास क्यों उत्पन्न करना चाहते हैँ। कोटा की अर्थ व्यवस्था पर उनका आक्रमण, कोटा के ह्रदय से कांग्रेस को समाप्त कर देना है। क्या कोटा के प्रति कोई अन्य दुर्भावना पनप रही है।
री नीट परीक्षा के ठीक पहले, अविश्वास,भ्रम और भय क्यों ?
दूसरा गहरा प्रश्न यह है कि छात्र संवाद, री नीट परीक्षा के ठीक चार दिन पहले क्यों ? इससे यह आशंका और जन्म लेती है कि क्या री नीट परीक्षा में कोई नया व्यवधान डालने का टूलकिट सक्रिय है।
इस कार्यक्रम में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने छात्रों और अभिभावकों के समक्ष कोई ठोस समाधान, स्पष्ट नीति अथवा भविष्य का सकारात्मक रोडमैप प्रस्तुत करने के बजाय मुख्य रूप से व्यवस्था के प्रति भय, असुरक्षा और भ्रम का वातावरण बनाने का प्रयास किया। संवाद का केंद्र समाधान नहीं, बल्कि असंतोष का विस्तार अधिक दिखाई दिया। इससे यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या इस प्रकार के आयोजनों का उद्देश्य वास्तव में छात्रों की समस्याओं का समाधान खोजना है, अथवा युवाओं के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ाकर राजनीतिक लाभ प्राप्त करना है।
सिर्फ भ्रमित करने और असमंजस फैलाने की बातें
राहुल गांधी का यह छात्र संवाद कार्यक्रम युवाओं के लिए कोई विशेष आकर्षक कार्यक्रम नहीं रहा। न तो युवाओं को कोई प्रेरणा, कोई मार्गदर्शन या कोई स्पष्ट दिशा देने वाली बात सामने आई और न ही पूरे कार्यक्रम में गंभीरता तथा भरोसा स्थापित करने वाली अभिव्यक्ति दिखाई दी। इसके विपरीत वे छात्रों और अभिभावकों के बीच अनावश्यक भय और भ्रम उत्पन्न करते दिखाई दिए। कार्यक्रम मुख्यतः भय और भ्रम का वातावरण बनाने तक ही सीमित रहा। इसलिए मौलिक दृष्टि से यह कार्यक्रम सफल नहीं कहा जा सकता।
यदि किसी आंदोलन या संवाद के पीछे सुधार का स्पष्ट लक्ष्य न होकर केवल असंतोष और टकराव को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति हो, तो वह अंततः अराजकता को ही जन्म देता है। इसी दृष्टि से देखा जाए तो यह आयोजन भी छात्रों को भयभीत और भ्रमित करने तक सीमित रहा तथा अप्रत्यक्ष रूप से व्यवस्था-विरोधी मानसिकता और अराजकता को प्रोत्साहित करने का प्रयास अधिक था।
क्या यह राहुल गाँधी की री लॉन्चिंग है ?
बंगाल चुनाव के बाद भाजपा से ज्यादा कांग्रेस खुश है। क्योंकि गठबंधन के लगभग सारे कांटे साफ हो गये, मात्र अखिलेश को छोड़ कर।अब 2029 का लोकसभा चुनाव उन्हें नेतृत्व की दृष्टि से कुछ अधिक आसान है और इसी संदर्भ में उनकी री-लॉन्चिंग, उनकी पार्टी द्वारा की गई है। भले ही बहाना नीट परीक्षा, पेपर लीक और छात्र संवाद का रहा हो, किंतु असली कहानी राहुल गांधी को पुनः सबसे बड़े नेता के रूप में जनता के बीच री-लॉन्च करने की है और इसके पीछे मूल मकसद 2029 का आम चुनाव ही है। कोटा कोचिंग का सबसे बढ़ा हब है एक साथ पूरे देश में सन्देश चला जाये यही योजना है। भले ही इसमें कोटा का नुकसान हो जाये।
हालांकि राहुल गांधी के जो भी कार्यक्रम, योजनाएं और वक्तव्य होते हैं, उनके पीछे बहुत सारे विदेशी दिमाग, छवि निर्माण करने वाली कंपनियां, विज्ञापन एवं मीडिया प्रबंधन से जुड़े लोग और कुछ हद तक विदेशों में डीप स्टेट के रूप में किसी भी देश की व्यवस्था को बाधित करने वाली अराजकतावादी शक्तियां भी काम करती प्रतीत होती हैं। यह कार्यक्रम इनमें से किसी की भी प्रेरणा का परिणाम हो सकता है, किंतु भारत के परिप्रेक्ष्य में राहुल गांधी का छात्र संवाद कार्यक्रम तथाकथित “कॉकरोच पार्टी” के जन्म से उत्पन्न चिंताओं के इर्द-गिर्द भी अधिक दिखाई देता है।
क्या कांग्रेस कॉकरोज से भयभीत है ?
कांग्रेस के मन में भय है कि कहीं आम आदमी पार्टी का नया प्रतिरूप कही जाने वाली सोशल मीडिया की “कॉकरोच पार्टी” भारत के युवाओं में अपना अस्तित्व न बना ले और राहुल गांधी हमेशा के लिए भारतीय राजनीति के केंद्र से बाहर न हो जाएं। इसी चिंता और भय से उत्पन्न यह छात्र संवाद कार्यक्रम है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। सामान्य राजनीतिक शब्दों में इसे राहुल गांधी का री-लॉन्चिंग कार्यक्रम कहा जा सकता है।
स्वयं के संगठन का अपमान ?
कोटा में आयोजित इस कार्यक्रम के लिए पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट, कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली सहित एक दर्जन से अधिक बड़े नेता सक्रिय रहे। आसपास के लगभग एक दर्जन जिलों में भी कांग्रेस संगठन पूरी तरह जुटा रहा, किंतु छात्र इसमें अपेक्षित रूप से नहीं जुड़े।
कोटा के छात्र संवाद कार्यक्रम का सबसे बुरा और राजनीतिक दृष्टि से सबसे गलत पहलू यह था कि कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ताओं को, जिन्होंने अपना पूरा जीवन पार्टी के लिए समर्पित कर दिया और हर परिस्थिति में संगठन का साथ निभाया, उन्हें एक तरफ दर्शक दीर्घा में बैठा दिया गया। मानो उन्हें डस्टबिन में डाल दिया गया हो। जैसे ये सारे कांग्रेसजन केवल चाकरी करने तक ही सीमित हों।
कार्यकर्ताओं को केवल चाकरी तक सीमित रखने की यह प्रवृत्ति परिवारवादी पार्टियों की विशेषता रही है। इसी कारण ऐसी परिवारवादी पार्टियां टूटती हैं, बिखरती हैं और इनके भीतर से नई पार्टियां जन्म लेती हैं। राहुल गांधी के छात्र संवाद कार्यक्रम में पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति जो नजरिया सार्वजनिक रूप से देखने को मिला, वह भविष्य में कांग्रेस में किसी नई टूट और नए बिखराव का संकेत भी देता है।
्सिर्फ लाइम लाइट में बने रहने तक
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस में अधिकांश मुद्दे किसी सुधार के लिए नहीं उठाए जाते, बल्कि घेराव, अराजकता, अवरोध और राजनीतिक दबाव बनाने के लिए उठाए जाते हैं। फिर उन्हें छोड़कर दूसरा मुद्दा पकड़ लिया जाता है। पहले मुद्दे का क्या हुआ, इससे किसी को कोई लेना-देना नहीं रहता। कांग्रेस द्वारा पिछले 10–12 वर्षों में उठाए गए मुद्दों का विश्लेषण किया जाए तो यही निष्कर्ष निकलता है कि मुद्दा उठाया गया, उसके माध्यम से स्वयं को स्थापित करने का प्रयास किया गया और फिर उसे छोड़कर आगे बढ़ गए।
राहुल गांधी की मीडिया मैनेजमेंट टीम का लक्ष्य समाचार-पत्रों और मीडिया की सुर्खियों में बने रहना होता है, भले ही वे देश की जनता को स्वीकार्य हों या नहीं। इसी कारण इन मुद्दों का राजनीतिक लाभ कांग्रेस को नहीं मिल पाता, बल्कि कई बार हानि ही उठानी पड़ती है।
ताजा उदाहरण के रूप में कांग्रेस द्वारा उठाया गया वोट चोरी का मुद्दा और एसआईआर का विरोध देखा जा सकता है। किंतु जनता के बीच इन मामलों से कांग्रेस की छवि बिगड़ी और जनता ने उन्हें नकार दिया।
अर्थात जब तक कोई भी मुद्दा स्पष्ट विकल्प और सुधार के एजेंडे के साथ न हो, तब तक केवल व्यवस्था परिवर्तन की बात करना पर्याप्त नहीं होता। व्यवस्था परिवर्तन के बाद क्या लाया जाएगा, यदि यह स्पष्ट न हो, तो ऐसे मुद्दे आत्मघाती सिद्ध होते हैं। यही स्थिति छात्र संवाद कार्यक्रम की भी दिखाई देती है।
आज का समाज और विशेषकर युवा वर्ग बहुत तेजी से सोचता और समझता है। किसी भी कार्यक्रम के प्रारंभ होने से पहले ही उसके उद्देश्यों और संभावित राजनीतिक लाभों का आकलन कर लिया जाता है। लोगों को यह समझ में आ जाता है कि इसके पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या है और इससे किस प्रकार का लाभ उठाने का प्रयास किया जा रहा है।
भारत के युवाओं का आदर्श पवनपुत्र हनुमान जी
कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का छात्र संवाद कार्यक्रम किसी टूलकिट का हिस्सा भी हो सकता है, किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा हो सकता है, युवाओं को भड़काने और उन्हें सड़कों पर उतारने का लक्ष्य भी इसके पीछे हो सकता है। किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत का युवा अपना आदर्श बजरंगबली, हनुमानजी और पवनपुत्र को मानता है तथा वह अधर्म और राष्ट्रविरोधी प्रवृत्तियों की लंका जलाने का भी सामर्थ्य रखता है।
नकारात्मक छवि के सारे टैग राहुल गाँधी के साथ
राहुल गांधी के छात्र संवाद कार्यक्रम के उल्टे परिणाम भी निकल सकते हैं, क्योंकि राहुल गांधी की छवि राष्ट्र विरोधी, अराजकतावादी, तुष्टिकरणवादी तथा विशेष रूप से हिंदुत्व विरोधी नेता की रही है। इतनी सारी नकारात्मक छवियों और भारत विरोधी आरोपों के साथ वे भारत के नायक नहीं बन सकते, क्योंकि भारत का जनमानस अपनी समझ और अनुभव के आधार पर सब कुछ देखता और परखता है। वर्तमान में प्रधानमंत्री मोदीजी का कोई विकल्प दूर दूर तक नहीं है।






