Thursday, June 4, 2026
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ग़ज़ल-कृष्ण ‘राम’ पंकज ✍

मुंतशिर रात का आलम, ओ – तेरे रुखसार की बातें |

बड़ा संभला हुआ है दिल, हुईं जो प्यार की बातें ||

चाँदनी के शबाब पे अदना सा वो तिल काला ,

नजरें रह रहकर कह रहीं हैं गुले गुलजार की बातें ||

अजब सी कशमकश, मिलाये नजरें मिलती ही नहीं,

मानो के कर रही हों,ये तुमसे मनुहार की बातें ||

दबे दबे लबों से हंसी का यूं खिलखिलाना ,

ज्युं कलियाँ कर रही हो, बाग-ओ-बहार की बातें ||

हया में शोखियाँ, लड़कपन की अदाएं भी ,

बड़ी ही कातिलाना हैं, मेरे दिलदार की बातें ||

हुआ यूं ही नहीं आशिक कोई ,मुहब्बत रास आई हो,

बेफ़िजूल सी लगती है दीवानों को, दर-ओ-दीवार की बातें ||

स्वरचित :-

कृष्ण “राम” पंकज

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