मुंतशिर रात का आलम, ओ – तेरे रुखसार की बातें |
बड़ा संभला हुआ है दिल, हुईं जो प्यार की बातें ||
चाँदनी के शबाब पे अदना सा वो तिल काला ,
नजरें रह रहकर कह रहीं हैं गुले गुलजार की बातें ||
अजब सी कशमकश, मिलाये नजरें मिलती ही नहीं,
मानो के कर रही हों,ये तुमसे मनुहार की बातें ||
दबे दबे लबों से हंसी का यूं खिलखिलाना ,
ज्युं कलियाँ कर रही हो, बाग-ओ-बहार की बातें ||
हया में शोखियाँ, लड़कपन की अदाएं भी ,
बड़ी ही कातिलाना हैं, मेरे दिलदार की बातें ||
हुआ यूं ही नहीं आशिक कोई ,मुहब्बत रास आई हो,
बेफ़िजूल सी लगती है दीवानों को, दर-ओ-दीवार की बातें ||
स्वरचित :-
कृष्ण “राम” पंकज





