ग़ज़ल
कोई छप्पर या छान लेते हैं
चलिए हम भी मकान लेते हैं
ख़ुद के पंखों पे है यकीं जिनको
वो ही पंछी उड़ान लेते हैं
जिनकी अपनी नहीं ज़बाँ कोई
वो भी मुझसे ज़बान लेते हैं
एक पंछी से उसके हिस्से का
आप क्यों आसमान लेते हैं
आप आँखों पे बांधकर पट्टी
क्यों हर इक बात मान लेते हैं
वो ही पाते हैं मंजिलें अक्सर
जो कहीं दिल में ठान लेते हैं
आज फिर रोटियां दिखाकर वो
हमसे झूठे बयान लेते हैं
सब्र वाले भी इस ज़माने में
इक न इक दिन उफान लेते हैं
केस इन पर भी तो चले साहिब
हुस्न वाले भी जान लेते हैं
सुन्दर सिंह




