आखिरश इश्क़ में मिला क्या है।
दर्द का एक सिलसिला क्या है।
मौत आये तो हम यही पूछें।
जिंदगी से तुम्हें गिला क्या है।
चमन में हर कोई परिशां है।
शाख-दर-शाख ये खिला क्या है।
शुक्र पहलु में दिल धड़कता है।
फानी दुनियां में कामिला क्या है।
सच तो ये है सच कहूं मैं “रैहान”।
ठोकरों का मिला सिला क्या है।
✍–हलीम “रैहान”




