Saturday, May 23, 2026
IMG-20260122-WA0067
previous arrow
next arrow

Top 5 This Week

Related Posts

आभासी रिश्तों की भीड़ में खोता वास्तविक अपनापन – परमानन्द गोयल 

लेखक: परमानन्द गोयल

कोटा, आज के दौर में हम ‘कनेक्टेड’ तो बहुत हैं, लेकिन वास्तव में ‘जुड़े’ हुए नहीं हैं। तकनीक ने दुनिया को मुट्ठी में समेट दिया है, पर दिलों के बीच की दूरियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। डिजिटल क्रांति के इस युग में स्मार्टफोन और इंटरनेट ने पूरी दुनिया को एक ‘वैश्विक गाँव’ (Global Village) में बदल दिया है। हमारी मित्रता, संवेदनाएँ और संवाद अब एक क्लिक तक सीमित होकर रह गए हैं।

लेकिन इस चमकती आभासी दुनिया के पीछे एक कड़वा सच भी छिपा है—हम एक-दूसरे के करीब नहीं आ रहे, बल्कि केवल सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं।

लाइक’ की भीड़ में अकेला इंसान

आभासी दुनिया का आकर्षण असंदिग्ध है। सोशल मीडिया पर मिलने वाले सैकड़ों ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ क्षणिक खुशी तो देते हैं, लेकिन वे आत्मीयता का विकल्प नहीं बन सकते। आज हमारे डिजिटल मित्रों की संख्या हजारों में हो सकती है, पर जीवन के कठिन मोड़ों पर साथ खड़े होने वाले लोग बहुत कम रह गए हैं।

जन्मदिन पर हजारों शुभकामना संदेश मिल जाते हैं, लेकिन कंधे पर हाथ रखकर हौसला देने वाला अपनापन कहीं खोता जा रहा है। हमने संपर्क (Contact) तो बढ़ा लिया, पर संबंध (Connection) की गहराई धीरे-धीरे कम होती चली गई।

डाइनिंग टेबल पर पसरा सन्नाटा

आज परिवार एक ही घर में रहते हुए भी अलग-अलग स्क्रीन में कैद होता जा रहा है। डाइनिंग टेबल पर संवाद की जगह मोबाइल ने ले ली है। आत्मीय मुलाकातों की जगह वीडियो कॉल और इमोजी ने संबंधों को औपचारिक बना दिया है।

वास्तविक रिश्तों को समय, धैर्य और भावनात्मक निवेश की आवश्यकता होती है, लेकिन तेज़ रफ्तार जीवनशैली में हम इन सबसे बचने लगे हैं। तकनीक सुविधा तो दे सकती है, लेकिन वह उस मानवीय स्पर्श का विकल्प कभी नहीं हो सकती, जो किसी अपने के साथ बैठने, मुस्कुराने या गले मिलने से महसूस होता है।

सोशल मीडिया की ‘परफेक्ट लाइफ’ की चमक कई लोगों में हीनभावना, तनाव और अकेलेपन को भी बढ़ा रही है।

संतुलन की अनिवार्य आवश्यकता

समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि उसके अति-उपयोग और उस पर बढ़ती निर्भरता में है। जब आभासी दुनिया वास्तविक जीवन पर हावी होने लगे, तब यह समझ लेना चाहिए कि हम धीरे-धीरे अपनी जड़ों से कट रहे हैं।

समय की आवश्यकता है कि हम ‘डिजिटल डिटॉक्स’ अपनाएँ, स्क्रीन टाइम सीमित करें और परिवार व मित्रों के साथ आमने-सामने संवाद को प्राथमिकता दें। रिश्तों को केवल ऑनलाइन उपस्थिति नहीं, बल्कि भावनात्मक उपस्थिति की भी आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष : तकनीक साधन है, साध्य नहीं

हमें तकनीक और आत्मीयता के बीच एक संतुलित रेखा खींचनी होगी। बुजुर्गों के अनुभव सुनने, बच्चों के साथ खेलने और मित्रों से व्यक्तिगत रूप से मिलने का कोई डिजिटल विकल्प नहीं हो सकता।

याद रखिए, वास्तविक रिश्ते जीवन की वह अमूल्य पूंजी हैं जिन्हें केवल ‘रिचार्ज’ नहीं, बल्कि प्रेम, समय और संवेदनाओं से निरंतर ‘सींचना’ पड़ता है। यदि हम संबंधों की गर्माहट को बचाए रख सके, तभी हमारी मानवीय संवेदनाएँ जीवित रह पाएँगी। अन्यथा, इंसानों की इस भीड़ में हम केवल एक ‘प्रोफाइल’ बनकर रह जाएँगे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles