Thursday, May 28, 2026
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ग़ज़ल-वक्त़ ने दिए जो घाव तो वक्त़ ही मरहम होगा

1 वक़्त ने दिये जो घाव तो वक़्त ही मरहम होगा ,

वक़्त बना गर बैरी तो वक़्त ही रहबर होगा ‘

वक़्त एक सा हुआ कब,कहाँ , किसी का ,

वक़्त बना जो दुश्मन तो फिर वक़्त ही दिलबर होगा !

2. कलम खामोश है ज्यूँ शब्दों ने मुंह फेर लिया हो ,

पड़ गया हो अकाल रेत के बवंडर ने घेर लिया हो ,

चलेगी फिर हवाएँ यूं के लफ़्जों की बारिशें होगी ,

फिर मेरी कलम होगी ओर होगा जानमाना अक्षरों का समंदर !

3. मैंने आज माँ का दिल दुखाया है, रब मुझे माफ न करे ,

मैंने दुआओं भरी आँखों को रुलाया है , रब मुझे माफ न करे ,

रब भूल जाएगा मगर मेरी हर गलती, हर गुस्तागी, के

मैंने माँ के आँचल में फिर सर छुपाया है , रब मुझे माफ न करे !

4. बर्बाद कर लिया खुद को मैंने एक तुझे अपना बनाने में ,

नासमझ बन बैठा हूँ खुद एक तुझे समझाने में ,

गुजर गया कहने को जो कीमती था वक़्त मेरा ,

कोई तक़ाज़ा-ए-उम्मीद नहीं अब तुझसे रूठने तुझे मनाने में !

5. गुमाँ आज भी इस बात का है ,

मैं उस परवरिश का हिस्सेदार हूँ ,

जहाँ रिश्तों की महक को ,

बनावट की खुशबू से नहीं तौला करते

कृष्ण ”राम” पंकज

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