ग़ज़ल
हुए हैं जितने सितम* ज़ेरे-आसमाॅं* लिख दूँ।
लो आज अपनी तबाही की दास्ताँ लिख दूँ।।
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कहाँ-कहाँ पे गिरी हैं ये बिजलियाँ लिख दूँ।
मिलाये ख़ाक में किस-किस के आशियाॅं* लिख दूँ।।
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हज़ारों घर हुए बरबाद ज़लज़लों* से यहाँ।
ज़मीन खा गई कितनी ही बस्तियाँ लिख दूँ।।
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लगी है आग तो उसको मैं आग लिक्खूॅंगा।
ज़माना लाख कहे उसको क्यूँ धुआँ लिख दूँ।।
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यही है आरज़ू मेरी यही तमन्ना है।
ग़ज़ल में शेर कोई मैं भी जाविदाॅं* लिख दूँ।।
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किया है फिर मेरे क़ातिल* ने सर तलब* मेरा।
मैं सोचता हूंँ कि अबके जवाब हाॅं लिख दूँ।।
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सिवाए इनके मेरे पास कुछ नहीं “अनवर”।
तुम्हारे नाम कहो तो ये जिस्मो-जाॅं लिख दूँ।।
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शब्दार्थ:-
सितम*ज़ुल्म,अत्याचार,
ज़ेरे-आसमाॅं*आसमान के नीचे ज़मीन पर
आशियाॅं*घोंसला घर
ज़लज़ले*भूकम्प
जाविदाॅं *हमेशा रहने वाला शाश्वत
क़ातिल* क़त्ल करने वाला प्रेमिका
तलब*माॅंगना
✍शकूर अनवर
📞9460851271





