Saturday, April 18, 2026
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ग़ज़ल-हुए है जितने सितम जेरे-आसमाँ लिख दूँ-शकूर अनवर

ग़ज़ल

हुए हैं जितने सितम* ज़ेरे-आसमाॅं* लिख दूँ।

लो आज अपनी तबाही की दास्ताँ लिख दूँ।।

*

कहाँ-कहाँ पे गिरी हैं ये बिजलियाँ लिख दूँ।

मिलाये ख़ाक में किस-किस के आशियाॅं* लिख दूँ।।

*

हज़ारों घर हुए बरबाद ज़लज़लों* से यहाँ।

ज़मीन खा गई कितनी ही बस्तियाँ लिख दूँ।।

*

लगी है आग तो उसको मैं आग लिक्खूॅंगा।

ज़माना लाख कहे उसको क्यूँ धुआँ लिख दूँ।।

*

यही है आरज़ू मेरी यही तमन्ना है।

ग़ज़ल में शेर कोई मैं भी जाविदाॅं* लिख दूँ।।

*

किया है फिर मेरे क़ातिल* ने सर तलब* मेरा।

मैं सोचता हूंँ कि अबके जवाब हाॅं लिख दूँ।।

*

सिवाए इनके मेरे पास कुछ नहीं “अनवर”।

तुम्हारे नाम कहो तो ये जिस्मो-जाॅं लिख दूँ।।

*

शब्दार्थ:-

सितम*ज़ुल्म,अत्याचार,

ज़ेरे-आसमाॅं*आसमान के नीचे ज़मीन पर

आशियाॅं*घोंसला घर

ज़लज़ले*भूकम्प

जाविदाॅं *हमेशा रहने वाला शाश्वत

क़ातिल* क़त्ल करने वाला प्रेमिका

तलब*माॅंगना

✍शकूर अनवर

📞9460851271

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