-जितेंद्र कुमार शर्मा
बारां । जिला बारां की जैव-विविधता से भरपूर शाहबाद घाटी में ग्रीनको एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड, हैदराबाद द्वारा प्रस्तावित निजी बिजली परियोजना के नाम पर लाखों पेड़ों की कटाई की अनुमति देना न केवल पर्यावरण-विरोधी है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन के अधिकार और भावी पीढ़ियों के भविष्य पर सीधा हमला है। समिति के संरक्षक और पर्यावरण कार्यकर्ता प्रशांत पाटनी
ने कहा कि “शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति, बारां के तत्वावधान में चल रहे “शाहबाद जंगल बचाओ आंदोलन” के अंतर्गत हम इस सरकारी–कॉरपोरेट सांठगांठ की कड़ी निंदा करते हैं। तथाकथित ‘हरित ऊर्जा’ की आड़ में जंगल उजाड़ने का लाइसेंस देना पर्यावरणीय पाखंड है। जंगल काटकर हरित विकास का दावा करना सफेद झूठ है।”
चंबल संसद के संयोजक और शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति बारां के अन्य संरक्षक बृजेश विजयवर्गीय ने कहा कि
> “शाहबाद की घाटी केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि यह पानी, मिट्टी, वन्यजीव और स्थानीय आजीविका की जीवनरेखा है। सरकार यदि कॉरपोरेट दबाव में आकर जंगलों को बलि का बकरा बना रही है, तो यह जनविरोधी और राष्ट्रविरोधी निर्णय है। हम इस विनाश को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे।”
उन्होंने आगे कहा कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) की प्रक्रियाएं खोखली औपचारिकताएं बन चुकी हैं। स्थानीय ग्राम सभाओं की सहमति, वन्यजीव गलियारों, जलस्रोतों और आदिवासी/स्थानीय समुदायों के अधिकारों को सुनियोजित ढंग से नजरअंदाज किया जा रहा है। यह कानूनी और नैतिक दोनों स्तरों पर अपराध है।
प्रशांत पाटनी ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार से मांग की कि “शाहबाद घाटी में प्रस्तावित परियोजना हेतु दी गई सभी वन-कटाई अनुमतियाँ तत्काल निरस्त की जाएँ।
स्वतंत्र, पारदर्शी और वैज्ञानिक पुनः EIA कराई जाए, जिसमें स्थानीय समुदायों की वास्तविक सहमति हो।
वैकल्पिक स्थानों पर परियोजना पर विचार किया जाए, जंगल नहीं, समाधान खोजे जाएँ।
. पर्यावरणीय क्षति के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कंपनी पर कड़ी जवाबदेही तय हो।”
दोनों पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ताओं ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि
“यदि सरकार और कंपनी ने शाहबाद के जंगलों पर यह हमला नहीं रोका, तो आंदोलन को राज्यव्यापी जनांदोलन में बदला जाएगा। कानूनी, सामाजिक और लोकतांत्रिक हर मंच पर आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी।”





