✍️डॉ नयन प्रकाश गांधी ,पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट
भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल अपने पद से नहीं, बल्कि अपने आचरण, सोच और संवेदनशील फैसलों से पहचाने जाते हैं। सुषमा स्वराज जी ऐसी ही एक विलक्षण नेता थीं। उनकी राजनीति सत्ता के प्रदर्शन की नहीं, सेवा और समर्पण की राजनीति थी। उनकी कूटनीति केवल राष्ट्रहित तक सीमित नहीं थी, उसमें मानवीय संवेदना की गहरी झलक भी दिखाई देती थी।
14 फरवरी 1952 को जन्मीं सुषमा स्वराज जी ने छात्र जीवन से ही नेतृत्व की स्पष्ट पहचान बना ली थी। कानून की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने सार्वजनिक जीवन में कदम रखा और यह कदम किसी अवसरवाद के कारण नहीं, बल्कि एक मजबूत वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ था। वे केवल प्रभावशाली वक्ता नहीं थीं, बल्कि विषय को गहराई से समझने वाली और आम जन की भावनाओं को सरल शब्दों में व्यक्त करने वाली नेता थीं। राजनीति में उनका प्रवेश भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से हुआ, जहां उन्होंने संगठनात्मक अनुशासन और विचारों की स्पष्टता को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाया।संसद में सुषमा स्वराज जी का बोलना अपने आप में सीख देने वाला होता था। उनके भाषणों में तथ्य भी होते थे, तर्क भी और संवेदना भी। सत्ता पक्ष में हों या विपक्ष में, वे हमेशा संसद की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करती रहीं। उनकी बातों में कटुता नहीं, बल्कि दृढ़ता होती थी। आलोचना करते समय भी वे मर्यादा नहीं भूलती थीं और असहमति में भी शालीनता बनाए रखती थीं।2014 से 2019 तक विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने भारतीय कूटनीति को एक मानवीय चेहरा दिया। इस दौरान विदेश मंत्रालय केवल फाइलों और औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे आम भारतीय के जीवन से जुड़ा। सोशल मीडिया के माध्यम से विदेशों में फंसे भारतीय नागरिकों की मदद करना उनकी कार्यशैली की पहचान बन गया। युद्धग्रस्त क्षेत्र हो, चिकित्सा आपात स्थिति हो या कानूनी संकट, उनकी तत्परता ने लाखों भारतीयों के मन में भरोसा पैदा किया। पहली बार विदेश मंत्री का पद आम जनता को इतना सुलभ और संवेदनशील महसूस हुआ।
जब दुनिया सोशल मीडिया को केवल संवाद का साधन मान रही थी, तब सुषमा स्वराज जी ने उसे सेवा का माध्यम बना दिया। एक ट्वीट पर संज्ञान, एक अपील पर त्वरित कार्रवाई, यही वजह थी कि वे केवल विदेश मंत्री नहीं रहीं, बल्कि विदेशों में बसे भारतीयों के लिए संकट के समय सहारा बन गईं। यह विश्वास किसी आदेश से नहीं, बल्कि करुणा और मानवीय दृष्टि से पैदा हुआ था।
भारतीय राजनीति में वे नारी नेतृत्व की एक सशक्त और गरिमामयी पहचान थीं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि नेतृत्व में संवेदनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत होती है। वे युवा महिलाओं के लिए प्रेरणा थीं और यह संदेश देती थीं कि राजनीति केवल संघर्ष का क्षेत्र नहीं, बल्कि संवाद और समाधान का भी माध्यम है।उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं था, बल्कि उस मूल्य आधारित राजनीति का सम्मान था, जिसमें राष्ट्रहित और मानवीय संवेदना साथ साथ चलती है।सार्वजनिक जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद उनका निजी आचरण सादगी और अनुशासन का उदाहरण था। वे अपने विचारों में स्पष्ट, फैसलों में दृढ़ और संबंधों में आत्मीय थीं। उनकी राजनीति में अहंकार नहीं था, आत्मविश्वास था। प्रचार से अधिक उनके कार्यों का प्रभाव दिखाई देता था।
6 अगस्त 2019 को उनका असमय जाना भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ी क्षति थी। उनके जाने से केवल एक पद खाली नहीं हुआ, बल्कि संवेदनशील और मर्यादित राजनीति की एक जीवंत मिसाल भी हमसे दूर चली गई। आज जब राजनीति में शोर अधिक और संवाद कम नजर आता है, तब सुषमा स्वराज जी का स्मरण और भी जरूरी लगता है।आज की राजनीति को उनसे यह सीख लेनी चाहिए कि सत्ता सेवा का माध्यम है, लक्ष्य नहीं। कूटनीति केवल रणनीति नहीं, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी भी है। और एक जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होता है।उनकी जयंती पर केवल नमन करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके मूल्यों और कार्यशैली को अपनाना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनका जीवन यह सिखाता है कि जब राजनीति संवेदना से जुड़ जाती है, तब वह राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त साधन बन जाती है।आपका व्यक्तित्व, आपकी वाणी और आपकी करुणा भारतीय लोकतंत्र की अमूल्य धरोहर बनी रहेगी उसे आज आत्मसात कर लेना आपके लिए असल में श्रद्धांजलि होगी।





