गीता श्लोक 1/21 और 1/22
(भाग – 2)
हे केशव! मेरा रथ दिनों सेनाओं जे बीच में ले चलो….
यहां प्रश्न उठता है कि केशव- दोनों सेनाओं के मध्य में रथ, कब तक खड़ा रखें?
उत्तर – अर्जुन कहते हैं कि युद्ध की इच्छा को लेकर कौरव सेना में आए हुए सेना सहित जितने लोग अर्थात राजा खड़े हैं, उन सबको जब तक मैं (अर्जुन) उन्हें देख न लूं, तब तक आप अर्थात (श्रीकृष्ण जी) रथ को वहीं खड़ा रखिए। मुझे यह जानना है कि –
– इस युद्ध के उद्योग अर्थात कार्य में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है
– – उनमें से कितने मेरे समान बल वाले हैं।
– – कौन-कौन मेरे से कम बल वाले हैं
– – कौन मेरे से अधिक बल वाले हैं।
– -उन सबको मैं जरा देख तो लूं।
युद्ध की कामना रखने वाले – अर्जुन कहते हैं कि जरा देखूं तो सही क़ि
– कौन-कौन योद्धा युद्ध करने की कामना रखते हैं-
– किस-किस के मन में युद्ध करने की इच्छा है?
गीता
श्लोक 2/2. (भाग -2)
अर्जुन! तेरे अन्दर यह कायरांता कहाँ से आई?…
भगवान बोले, हे अर्जुन! इस विषम अवसर पर तुम्हें यह कायरता कहां से आई अर्थात कहां से प्राप्त हुई? इसका श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते अर्थात इसको श्रेष्ठ पुरुष नहीं अपनाते। यह कायरता स्वर्ग को देने वाली नहीं है और कीर्ति – यश देने वाली भी नहीं है।
यहां पर भगवान ने अर्जुन का विशेष नाम लिया परंतप, जिसका अर्थ होता है शत्रुओं का दमन करने वाले, शत्रुओं को कष्ट देने वाले, शत्रुओं को तपाने वाले। और अर्जुन तुम निर्मल हृदय वाले योद्धा हो। अतः तुम्हारे अंदर यह कलुसता, कायरता कहां से आई? यह गुण तो क्षत्रिय के एकदम विरुद्ध है ।
गीता श्लोक 2/2 (भाग -3)
अर्जुन में कायरता……
भगवान यह भी आश्चर्य प्रकट करते हैं कि ऐसे युद्ध के मौके पर तो तुम्हारे अंदर उत्साह और शूरवीरता ही आनी चाहिए थी, परंतु बिना मौके तुम्हारे अंदर यह कायरता कहां से आ गई? भगवान का यहां पर जो आश्चर्यपूर्वक बोलना है, वह केवल अर्जुन को चेतन के लिए ही है, ताकि अर्जुन का ध्यान इस आने वाली कायरता से हटकर अपने मूल कर्तव्य पर चला जाए। भगवान पूछते हैं कि हे अर्जुन! तुम्हारे अंदर यह कायरता कहां से आई? भगवान उन्हें पूछते हैं कि अर्जुन तुम्हारे अंदर पहले तो यह करता नहीं थी, यह तो आई है अर्थात आने वाली है, आगंतुक है। अतः यह हमेशा रहने वाली भी नहीं है। शीघ्र ही चली भी जाएगी अर्थात शीघ्र विदा भी हो जाएगी ।
गीता श्लोक 2/3…
नपुंशकता आ तो गयी, पर अब क्या करें ?…….
भगवान कहते हैं कि हे पृथा नंदन अर्जुन! इस नपुंसकता को प्राप्त मत हो, क्योंकि तुम्हारे में यह नपुंसकता उचित नहीं है। हे परमतप अर्थात दुष्टों को ताप देने वाले अथवा दुख देने वाले, हृदय की इस दुर्बलता का त्याग करके, युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।
पार्थ- भगवान श्री कृष्ण, अर्जुन से पार्थ नाम लेकर यह बताना चाहते हैं कि तुम महारानी पृथा अर्थात कुंती के पुत्र हो। एक क्षत्राणी के पुत्र हो तो फिर कायर कैसे हो सकते हो? तुम अपने अंदर कायरता लाकर अपनी क्षत्रिय माता पृथा अर्थात कुंती के आदेश की अवहेलना नहीं कर सकते। तुम्हें माता कुंती के आदेश की अवहेलना नहीं करनी चाहिए अर्थात उनकी आज्ञा का पालन आपके द्वारा अवश्य किया जाना चाहिए। अतः क्षत्रानी माता के क्षत्रिय पुत्र को, युद्ध करना ही चाहिए और कायरता पूरी तरह त्याग देनी चाहिए।
नपुंसकता दो प्रकार से प्राप्त होती है –
अर्जुन में कायरता के कारण है एक – युद्ध करने को अधर्म मान रहे हैं।
दो – युद्ध न करने को धर्म मान रहे हैं ।
इसलिए भगवान कह रहे हैं कि युद्ध न करना कोई धर्म की बात नहीं। यह तो एक प्रकार की नपुंसकता है। इसलिए इस नपुंसकता को छोड़ दो और अपना क्षत्रिय वाला कर्तव्य निभाओ अर्थात युद्ध करो।परंतप अर्थात अर्जुन अर्जुन तुम तो शत्रुओं को तपाने वाले अर्थात कष्ट देने वाले हो। उन्हें भगाने वाले हो, तो फिर इस युद्ध से भाग कर, अपने शत्रु को खुश क्यों करना चाहते हो? तुम्हारे युद्ध से भाग जाने पर वह सब प्रसन्न हो जाएंगे। ऐसा तुमने सोचा है क्या?
गीता श्लोक 2/4…
अर्जुन उत्तेजित हो रहे हैं…
अर्जुन अपने अंदर कुछ उत्तेजना लाते हुए बोले -हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध कैसे करूं? क्योंकि हे अरिसूदन! यह दोनों, भीष्म और द्रोण पूजा करने योग्य हैं ।
मधुसूदन – अर्थात मधु नामक राक्षस / दानव को मारने वाले भगवान श्रीकृष्ण।
अरिसूदन – अर्थात शत्रुओं को मारने वाले भगवान श्री कृष्ण।
हे प्रभु आप तो दैत्यों और शत्रुओं का नाश करने वाले हो अर्थात उन्हें मारने वाले हो, (जो बिना कारण द्वेष रखते हैं) आप उनको मारते हो.। परंतु मेरे सामने तो पितामह भीष्म और गुरु द्रोण आदि हैं, जो हमारे पूजनीय हैं। अतः अपने हितैषी पितामह भीष्म और विद्या देने वाले गुरु द्रोणाचार्य को, मैं कैसे मारूं?
प्रभु! मैं कायरता के कारण युद्ध से विमुख नहीं हो रहा हूं, वरन धर्म को देखकर विमुख हो रहा हूं। प्रभु यह मेरी कायरता नहीं है। कायरता तो तब कही जाए, जब मैं मरने से डरूं। मैं मरने से नहीं डर रहा। वरन स्वजनों और पूजनीयों को मारने से डर रहा हूं। पितामाह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य का मेरे पर पूरा अधिकार है। यह तो मेरे पर प्रहार कर सकते हैं, परंतु बाणों से, मैं इन पर कैसे प्रहार करूं। मैं उनका प्रतिद्वंदी कैसे बन सकता हूं? यह दोनों तो मेरे द्वारा सेवा के योग्य हैं। ऐसे पूजनीयों को मैं बाणों से कैसे मार सकता हूं ?
श्रीमद्भगवद्गीता-कालीचरण राजपूत






