Saturday, April 18, 2026
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बच्चों को सद्गुणों की चर्चा उपहार में दें, श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन उमड़े हजारों श्रद्धालू

शुद्ध जीवन के लिए शुद्ध धन अनिवार्यः गोविंददेव गिरी

अखिल नामा ✍️बारां संवाददाता

बारां। स्वर्गीय मुरलीधर साबू मेमोरियल ट्रस्ट, बारां के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के सप्तम दिवस रविवार को कथा व्यास पीठाधीश्वर, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष एवं राष्ट्रीय संत स्वामी गोविन्ददेव गिरी महाराज ने कहा कि “शुद्ध जीवन के लिए शुद्ध धन की आवश्यकता” है। इस विषय पर संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली प्रवचन में उन्होंने कहा कि मानव जीवन की पवित्रता केवल आडंबर से नहीं, बल्कि आय के साधनों की शुद्धता से सुनिश्चित होती है। यदि धन अर्जन के साधन अशुद्ध, अन्यायपूर्ण या अनैतिक हैं, तो उससे प्राप्त सुख भी स्थायी नहीं हो सकता। शुद्ध धन से ही शुद्ध विचार, शुद्ध कर्म और अंततः शुद्ध जीवन संभव है। कृष्ण-सुदामा प्रसंग का वर्णन किया तो श्रद्धालू भावुक हो गए। इस बीच कृष्ण-सुदामा की झांकी प्रस्तुत की गई। जिसे देखने के लिए श्रद्धालुओं में उत्साह बना रहा।

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन में धर्म, नीति और सत्य के मार्ग पर चलकर अर्जित किया गया धन ही परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए कल्याणकारी होता है। महाराज ने युवाओं से विशेष रूप से आग्रह किया कि वे त्वरित लाभ के लोभ से बचें और ईमानदारी व परिश्रम को जीवन का आधार बनाएं।

उन्होंने कहा कि श्रीमद् भगवद् गीता मानव जीवन की चिंताओं का समाधान है। उन्होंने कहा कि “गीता सिखाती है कि प्रसन्न रहना हमारा स्वभाव है और चिंता करना हमारी अज्ञानता। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य को कर्म करना चाहिए, फल की चिंता छोड़ देनी चाहिए।

अर्थात् हमारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। जब हम फल की चिंता छोड़ देते हैं, तब मन स्वतः ही हल्का हो जाता है और जीवन में प्रसन्नता आती है।

चिंता का मूल कारण भविष्य का भय और अतीत का पश्चाताप है। गीता हमें वर्तमान में जीना सिखाती है। जो बीत गया, वह प्रभु की इच्छा थी और जो आने वाला है, वह भी उन्हीं के हाथ में है। इसलिए मनुष्य को केवल अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

भागवत में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति समत्व भाव में रहता है। सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहता है। वही सच्चा योगी है। ऐसा व्यक्ति चिंता से मुक्त और सदा प्रसन्न रहता है। जब हम अपने जीवन को ईश्वर को समर्पित कर देते हैं, तब चिंता का स्थान विश्वास ले लेता है और जीवन में स्थायी प्रसन्नता का वास हो जाता है।

परिवार में बच्चों के साथ सद्गुणों की चर्चा आवश्यक विषय पर बोलते हुए स्वामी गोविन्द देव गिरी महाराज ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में माता-पिता बच्चों के भौतिक विकास पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन चरित्र निर्माण और संस्कारों की उपेक्षा हो रही है। उन्होंने कहा कि यदि बचपन से ही बच्चों को सत्य, अहिंसा, सेवा, अनुशासन, श्रद्धा और संयम जैसे सद्गुणों की शिक्षा दी जाए, तो वे जीवन में सशक्त, संस्कारी और समाजोपयोगी नागरिक बनते हैं।

उन्होंने श्रीमद् भागवत के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि “प्रह्लाद, ध्रुव और भरत जैसे चरित्र हमें बताते हैं कि सद्गुणों की शिक्षा उम्र की मोहताज नहीं होती, बल्कि यह परिवार के वातावरण से संस्कारित होती है। स्वामी ने आग्रह किया कि परिवार के बड़े सदस्य बच्चों के साथ संवाद करें, कथा-कहानियों और उदाहरणों के माध्यम से उन्हें धर्म व नैतिकता से जोड़ें।“

 

जीव और परमात्मा के मिलन पर प्रवचन करते हुए उन्होंने श्रीकृष्ण और सुदामा प्रसंग से श्रोताओं को भजन, श्लोकों और प्रवचनों से भाव विभोर कर श्रद्धा व भक्ति के रंग से सराबोर कर दिया। कथा ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन विष्णु साबू परिवार द्वारा भगवान शिव, श्रीमद भागवत, कथा व्यास पीठाधीश्वर गोविन्द देव गिरी महाराज की आरती उतारी गई। जबकि कथा विश्राम के बाद हजारों श्रद्धालुओ ने महाप्रसादी प्राप्त की। साबू परिवार की ओर से विष्णु साबू, बजरंग साबू, सत्यप्रकाश साबू समेत ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने कथा आयोजन में सहभागी रहे सभी लोगों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

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