कोटा। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं भारत तिब्बत सहयोग मंच के प्रांतीय महामंत्री अरविन्द सिसोदिया ने कहा है कि “विपक्ष द्वारा खड़े किए गए एसआईआर के विरुद्ध नैरेटिव और फैलायी गई अफवाहों ने एसआईआर की गुणवत्ता को कुछ हद तक़ प्रभावित किया है। अनेक ऐसे नाम, जो भारत के नागरिक के रूप में होने चाहिए थे, जो कानूनन अस्तित्व में हैं और अधिकारवान हैं, वे भी काट दिए गए हैं। वहीं मतदाता सूची में फोटो अपडेट की प्रक्रिया भी प्रभावित हुई है। इसका एक कारण यह भी है कि एसआईआर कार्यक्रम के मध्य ही बूथों का पुनर्गठन कर दिया गया। परिणामस्वरूप लगभग प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में 80 – 90 प्रतिशत से अधिक बूथों के नंबर ही बदल गए।”
सिसोदिया ने कहा कि “एसआईआर में गणना प्रपत्र जिन बूथ क्रमांकों से भरे गए थे, उनका प्रारूप प्रकाशन और काटे गए नामों की सूची प्रकाशन अधिकांश अन्य बूथ क्रमांकों से की गई। इस कारण 90 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं को यह तक पता नहीं है कि उनका नाम सूची में है या काट दिया गया है। केवल बीएलओ को ही यह जानकारी है कि गणना का बूथ क्या था और प्रकाशन का बूथ कौन-सा है।”
सिसोदिया ने बताया कि “बीएलए-2 पर अधिकांश दलों का कोई प्रभावी कार्य नहीं है। इस बार अधिकतर दलों ने कोशिश की है और बीएलए-2 नियुक्त तो किए, पर ये नियुक्तियाँ अभी तक पूर्ण नहीं हुई हैं और जो नियुक्त हुए हैं, इन्हें समझने और सीखने में अभी समय लगेगा।”
उन्होंने कहा कि “अधिकांश बीएलओ और सर्वेयर ईमानदारी से कार्य कर रहे थे, लेकिन इस बीच विपक्षी दलों ने कार्य को प्रभावित करने के उद्देश्य से, सोची-समझी साजिश के तहत, ‘बीएलओ ने आत्महत्या कर ली’, ‘बीएलओ पर अत्यधिक कार्यभार है’ जैसी व्यापक अफवाहें फैलायीं। इसके माध्यम से निर्वाचन आयोग पर दबाव बनाने का प्रयास किया गया। जिसने निगेटिविटी को जन्म दिया।”
उन्होंने आगे कहा कि “दिल्ली में राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग चाहे जितना भी मजबूत और निष्पक्ष हो, बूथ स्तर पर उसे राज्य सरकार के कर्मचारियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही वह वजह है जिससे मतदाता सूची प्रभावित होती है। पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश सहित बीएलओ पर मजबूत राजनीतिक दलों का परोक्ष अपरोक्ष दबाव रहा, जिससे घबराहट भी फैली, असुरक्षा की भवना नें भी जन्म लिया और अफवाहों नें भी कार्य प्रभावित किया।”
सिसोदिया ने कहा कि “जहाँ कटे नामों पर निर्वाचन आयोग को आपत्तियाँ नहीं मिलने के प्रश्न का उत्तर बहुत सामन्य है, उसका कारण वास्तविक जानकारी का अभाव, जागरूकता की कमी और समय की कमी है। तकनीकी पहुंच की भी कमी। मूलतः आज भी मतदाता सूची को लेकर वह जागरूकता नहीं है जो जनाधार कार्ड, आधार कार्ड या पैन कार्ड को लेकर होती है। इस सूची को मतदाता सामान्यतः केवल मतदान के समय ही देखता है। इसलिए आपत्तियों का मूल भार राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर ही आता है।”
उन्होंने कहा कि “अफवाहों के कारण कार्य में शिथिलता आई और गुणवत्ता भी प्रभावित हुई, जिससे यह कार्य अभी भी त्रुटिपूर्ण है। इसे ठीक और पूर्णतः संतोषजनक बनाने हेतु काटे गए नामों की सूची का पुनरीक्षण होना चाहिए, नये फोटो अपलोड होनें चाहिए और कटे नामों में जो वास्तव में अभी भी मौजूद हैं, उन्हें पुनः जोड़ा जाना चाहिए।”






