गीता जयंती सप्ताह विशेष
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“गीता‑जयंती का यह दिन याद दिलाता है कि हर इंसान, चाहे छात्र हो या अधिकारी, अपने कर्म सुधार कर आज भी मोक्ष, नीति और मानसिक शांति की ओर लौट सकता है”
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✍️ डॉ नयन प्रकाश गांधी मैनेजमेंट विश्लेषक एवं अंतरराष्ट्रीय लाइफ कोच

मोक्षदा एकादशी को सरल भाषा में समझें तो यह “मोक्ष देने वाली एकादशी” है, यानी ऐसा दिन जो मनुष्य को भीतर की अशुद्धियों, पाप‑भाव और नकारात्मक सोच से मुक्त होकर शांति और ईश्वर के निकट जाने का अवसर देता है। मैनेजमेंट विश्लेषक एवं अंतरराष्ट्रीय लाइफ कोच डॉ नयन प्रकाश गांधी का मानना है कि “मोक्षदा” शब्द दो भागों से बना है “मोक्ष” यानी बंधनों से मुक्ति और “दा” यानी देने वाली,इसलिए यह तिथि केवल विधि‑विधान का पर्व नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला एवं आध्यात्मिक पड़ाव वाली तिथि मानी जाती है। इसी दिन कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया, इसलिए इसे गीता जयंती भी कहा जाता है । यानी ज्ञान, विवेक और धर्मपरक जीवन के पुनः स्मरण का उत्सव।यह दिन सवेरे उठकर स्नान करने, सादगी से व्रत रखने, भगवान विष्णु-कृष्ण की पूजा करने, तुलसी की वंदना करने, दीपदान और गीता के पाठ के माध्यम से मन और जीवन को पवित्र बनाने का अवसर माना जाता है।परंपरा यह नहीं कहती कि सिर्फ व्रत रखने से ही सब कुछ बदल जाएगा। असली बात यह है कि हम अपने व्यवहार में लोभ-मोह, क्रोध और स्वार्थ को कम करें। कर्मयोग की भावना से, ईमानदारी और धैर्य के साथ अपनी जिम्मेदारियों का पालन करें, और हर परिस्थिति में ईश्वर पर भरोसा बनाकर रखें।गीता सिखाती है कि कर्तव्य से कभी भागना नहीं चाहिए ,काम निष्काम भाव से, सच्चे मन और दृढ़ विश्वास के साथ करना चाहिए। मोक्षदा एकादशी हमें इसी सीख को जीवन में उतारने की प्रेरणा देती है।
यह दिन केवल पूजन-व्रत का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का भी महत्वपूर्ण समय है। गीता बताती है कि मनुष्य का हर कर्म उसके साथ जुड़ा रहता है ,अच्छा या बुरा, दोनों लौटकर आते हैं। यदि कोई व्यक्ति स्वार्थवश किसी को धोखा दे, किसी सज्जन का उपयोग कर उसे छोड़ दे, तो उस अधर्म का फल भी अंततः उसे अवश्य भुगतना पड़ता है। आज आधुनिक युग में मनुष्य मानवीय जीवन का मूल्य भूल सा गया है ,आए दिनों रिश्वत ,भ्रष्टाचार आदि में बड़े बड़े दिग्गज कारपोरेट लीडर्स ,सरकारी प्रशासनिक अधिकारी सब अपने नैतिक उत्तरदायित्व ,समाज के प्रति उत्तरदायित्व को भूल से गए है ,अच्छे पदों में रहते हुए सर्व संपन्न धन शानो शौकत होते हुए व्यक्ति के मन में न धन उपार्जन में संतोष है ,न चाल चरित्र में। आजकल दिखावे के नाम पर बड़े बड़े ट्रस्ट फाउंडेशन केवल धन को व्हाइट करने में लगे है कोई लाखों करोड़ों वृक्षारोपण के नाम पर ,कोई स्किलिंग प्रोजेक्ट के नाम पर ,कोई स्वास्थ्य अभियानों के नाम पर तो कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास ,रूरल डेवलपमेंट ,तकनीकी उन्नयन के नाम पर पैसा उठा रहा है ,अंतिम वर्ग को कौन किस स्तर तक फायदा पहुंचे इसके लिए कोई संवेदनशील नहीं है। यही नहीं जो पत्रकारिता सेवा का माध्यम थी आज वह भी व्यवसायीकरण की और उन्मुख होती जा रही है ,उच्चस्तरीय अखबार बिना ऑथेंटिकेट जानकारी के फर्जी सेवाओं के विज्ञापन भर भर कर लगाते है और बेचारे सामान्य आम जन उन उन फ्रड का शिकार होती है क्योंकि वह विज्ञापनों को सही समझ कर उन पर विश्वास कर लेते है। हालांकि कुछ छोटे मीडिया ,डिजिटल मीडिया ऐसे भी है जो निष्पक्ष खबरें ,सामाजिक पत्रकारिता ,सकारात्मक पत्रकारिता को कई दशकों से फॉलो करते आए है और अभी भी अपने मूल्य पर अडिग है । आज एक मनुष्य आमजन विश्वास करे तो किस पर करे। आज सोशल मीडिया ,डिजिटल मीडिया , टेली मीडिया के कारण बच्चे नहीं युवा वर्ग ,महिलाएं और वरिष्ठ जन पर नकारात्मक गलत प्रभाव पड़ता जा रहा है ,आज संयुक्त परिवारों में जो प्रेम स्नेह था अब वह एकल परिवार में बटने के बावजूद रिश्ता दिखावा मात्र रह गया है, ,महिलाए जो घर में नैतिकता ,पहली शिक्षिका का प्रतीक होती थी उन पर भी आधुनिकता की चकाचौंध चढ़ सी गई है ,आज हर समाज में पेरेंट्स जो जमीनी हकीकत से निकले आज वह अपने बच्चों के लिए रिश्ते पैकेज ,लेवल के आधार पर देख रहे है ,जबकि असल में अंदर से उनका लेवल चाहे गिरा हो बाहर से प्रदर्शन करना चाहता है ,अपने शानो शौकत का ,दिखावटीपन का ,आखिरकार यह कब तक चलेगा ,रिश्ते आजकल ऐसे टूट रहे है जैसे खाते समय मूली और गाजर ,आज की पीढ़ी में धैर्य नहीं है ,रिश्तों में प्रेम स्नेह गायब सा हो गया है ,आज की जनरेशन का चाहे पिता पुत्र हो पति पत्नी हो ,भाई भाई हो ,सगे संबंधी मित्र हो, अगर लायल्टी टेस्ट किया जाए तो अधिकतर शत प्रतिशत फैल होते हुए नजर आएंगे ,आपको पता होगा मुसीबत में बेटा माता पिता को छोड़ देता है ,कंगाली में पत्नी पति को तलाक दे देती है ,शादी के कुछ वर्षों बाद उच्च ओहदे पर पहुंचा पति पत्नी को छोड़ दूसरी शादी कर लेता है ,या अनैतिक संबंध बना लेता है ,भाई भाई की जरूरत के समय मुंह फेर लेता है, बहने बहकावे में या स्वार्थ वश अपने ससुराल को छोड़ कर पीहर पक्ष पर हक जमाने आ जाती है,आखिरकार यह सब क्या है,केवल और केवल वास्तविक आध्यात्मिकता से दूरी ,मनुष्य जीवन के असल मर्म से अनभिज्ञ अज्ञात रहना ,चकाचौंध की दुनिया में वित्तीय ,क्षणिक सुख को प्राथमिकता देना। आज का युवा जिन सेलिब्रिटी को देखकर हर चीज फॉलो करता है उन अधिकतर सेलिब्रिटीज के परिवार संस्कारों ,रीति रिवाज का अता पता नहीं है ,भारत देश में पाश्चात्य संस्कृति पल्लवित होती जा रही है जिस पर मनन करना होगा ,देव संस्कृति विश्विद्यालय शांतिकुंज से प्रशिक्षित पर्सनैलिटी कोच डॉ नयन प्रकाश गांधी के अनुसार गीता के अनुसार गलतियां हर इंसान से होती है चाहे भूलवश रिश्तों में कड़वाहट ,अनैतिक संबंध ,बहकावे में भ्रष्टाचार में लिप्त ,क्षणिक धन दौलत सुख हेतु अपने अपनों से धोखाधड़ी या फरेब परंतु अगर व्यक्ति लगातार गलती करे तो वह समाज का नैतिक पतन की और इंगित करता है। आज युवा नहीं रिटायर्ड वरिष्ठ परिजन भी इस रेस में शामिल हो गए है जीवन के अंतिम पड़ाव में उनमें न अध्यात्म है न नैतिकता का समावेश ,सब कुछ मीठा व्यक्तव्य और झूठा दिखावटीपन जीवन ,गांधी बताते है कि उन्होंने ऐसे कई वरिष्ठ जन देखे है जिनके पास लाखों करोड़ों की संपत्ति है परंतु फिर भी अनुभवी होने के बावजूद उनके अज्ञानता है ,आधुनिकता की चकाचौंध में वह भी अस्त व्यस्त है पता नहीं है कि उन्हें किस जगह सेवा में उपयुक्त जगह जीवन में रहते हुए उपयोगी सेवा दान करना चाहिए ,उन्हें पता नहीं है कैसे उन्हें अपने अर्जित धन का उपयोग स्वयं के बेहतर स्वास्थ्य ,परमार्थ और जीवन दर्शन में करना चाहिए ,कैसे ऐच्छिक रिटायरमेंट लेकर युवाओं को मौका देना चाहिए ,कैसे परिवार समाज ,राष्ट्र उन्नति में भागीदार बनना चाहिए ।आजकल कारपोरेट हो या राजनीतिक क्षेत्र या सामाजिक क्षेत्र हर जगह आपको बड़े से बड़े वरिष्ठ अनुभवी व्यक्ति उम्र के अंतिम पड़ाव में भी बिना संतुष्टि के अड़ियल स्वभाव से बने रहते है ,जिससे न परिवार समाज और देश हित में नवोन्मेष हो पाता है न कुछ ,आज एक सौ चालीस करोड़ की जनसंख्या वाले देश में अगर करोड़ों अनुभवी वरिष्ठ जन मार्गदर्शक के रूप में हर स्तर पर नए सक्रिय क्रियाशील ,ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तियों को मौका दे तो देश उन्नति में बड़ा परिवर्तन आ सकता है । यह संभव है जब आज के इस गीता दिवस मोक्षदा एकादशी के अवसर पर गीता के सिद्धांतों को अमल में लाया जाए जो राष्ट्र उत्थान प्रगति हेतु पहली आवश्यकता है । आज मोक्षदा एकादशी गीता जयंती के दिन हर मनुष्य को कम से कम गीता के आधारभूत सिद्धांतों को जीवन में अपनाना होगा तभी हम मनुष्य जीवन की सार्थकता सिद्ध कर पाएंगे और कई असंख्य योनियों के बाद प्राप्त मनुष्य जीवन में मोक्ष प्राप्त के लिए सार्थक कदम उठा पाएंगे जो मनुष्य जीवन की सार्थकता है।






