Wednesday, February 25, 2026
IMG-20260122-WA0067
previous arrow
next arrow

Top 5 This Week

Related Posts

श्रीम‌द्भगवद्गीता- कालीचरण राजपूत

गीता श्लोक 16/02…

दैवीय संपदा प्राप्त पुरुष के लक्षण…….

भगवान कहते हैं कि अहिंसा, सत्य भाषण, क्रोध न करना, संसार की कामना का त्याग करना, अंतःकरण में राग द्वेष जनित हलचल का न होना, चुगली न करना, प्राणियों पर दया करना, सांसारिक विषयों में न ललचाना, अंतःकरण की कोमलता, अकर्तव्य, करने में लज्जा, सफलता का अभाव…(3)

शरीर, मन, वाणी, भाव आदि द्वारा किसी का किसी प्रकार से अनिष्ट न करने को तथा अनिष्ट न चाहने को अहिंसा कहते हैं । वास्तव में अहिंसा तब होती है जब मनुष्य संसार की तरफ से विमुख होकर परमात्मा की ओर चला जाता है । तब उसके द्वारा अहिंसा का पालन स्वत हो जाता है । परंतु जो राग पूर्वक भोग बुद्धि से भोगों का सेवन करता है, वह कभी सर्वथा अहिंसक नहीं बन सकता । परमात्मा की ओर चलने वाले के द्वारा हिंसा नहीं होती, क्योंकि वह भोग बुद्धि से पदार्थ आदि का सेवन नहीं करता ।

गीता श्लोक 16/03…

दैवीय संपदा प्राप्त पुरुष के लक्षण ….

भगवान कहते हैं कि तेज अर्थात प्रभाव, क्षमता, धैर्य, शरीर की शक्ति, वैभव का न होना और मान को न चाहना । हे भरतवंशी अर्जुन! यह सभी दैवी संपदा को प्राप्त हुए मनुष्य के लक्षण हैं ।

महापुरुषों का संग मिलने पर उनके प्रभाव से प्रभावित होकर साधारण पुरुष भी दुर्गुण और दुराचारों का त्याग करके सद्गुण और सदाचारों में लग जाता है । महापुरुषों की बची उस शक्ति को ही तेज कहते हैं । ऐसे तो क्रोधी आदमी को देखकर भी लोगों को उसके स्वभाव के विरुद्ध काम करने में भी लगाता है, परंतु यह क्रोध रूप दोष का तेज है । बिना कारण अपराध करने वाले को दंड देने की सामर्थ रहते हुए भी, उसके अपराध को सह लेना और उसको माफ कर देना क्षमा है। किसी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति में विचलित न होकर अपनी स्थिति को कायम रहने की शक्ति का नाम धृति और धैर्य है । बाह्य और आंतरिक शुद्धि का नाम शौच है ।

गीता श्लोक 16/04..

अभिमान और क्रोध करना आसुरी मनुष्य के लक्षण हैं..

भगवान कहते हैं कि है पृथानंदन! दंभ करना, घमंड करना, और अभिमान करना, क्रोध करना तथा कठोरता रखना और अविविवेक का होना भी, यह सभी आसुरी संपदा को प्राप्त हुए मनुष्य के लक्षण हैं ।

इस श्लोक में आए हुए कुछ पदों को परिभाषित करना चाहेंगे जो इस प्रकार हैं_

एक _ दंभ_ मान, बढ़ाई, पद आदि प्राप्त करने के लिए अपनी चाहने वाली स्थिति न होने पर भी, वैसे ही स्थिति दिखाने का नाम दंभ है ।

दो_ दर्प या घमंड _ दर्प का दूसरा नाम घमंड भी है । धन, वैभव, जमीन, जायदाद, मकान, परिवार आदि ममता वाली चेष्टाओं को लेकर अपने में जो बड़प्पन का अनुभव होता है, उसे दर्प कहते हैं ।

तीन _अभिमान _अहंकार वाली वस्तुओं को लेकर अर्थात सूक्ष्म स्थल और कारण शरीर को लेकर अपने में जो बड़प्पन का अनुभव होता है, उसका नाम अभिमान है।

चार _ पारूष्य _का दूसरा नाम कठोरता है, । विवेक का नाम अज्ञान है । प्राणों में मनुष्य का ज्यों ज्यों मुंह बढ़ता है, त्यों त्यों आसुरी संपत्ति भी अधिक बढ़ जाती है, इससे वह दूसरों की जान भी ले सकता है ।उसमें कठोरता कहलाती है ।

गीता श्लोक 16/05…

संपत्तियों का फल….

भगवान कहते हैं कि दैवी संपत्ति मुक्ति के लिए और आसुरी संपत्ति बंधन के लिए मानी गई है । हे पांडव अर्जुन! तुम दैवी संपत्ति को प्राप्त हुए हो, इसलिए तुम शोक मत करो ।

मुझे तो भगवान की तरफ चलना है, यह भाव साधक जितना स्पष्ट रूप से जान जाता है, उतना ही वह भगवान के सम्मुख हो जाता है । भगवान के सम्मुख होने से उसमें संसार से विमुक्ति आ जाती है । इससे उसके अंदर के दुराचार कम होने लगते हैं । बाद में सद्गुण और सदाचार प्रकट होने लगते हैं । इससे साधक की भगवान में उनके गुण, रूप, लीला में रुचि हो जाती है । साधक का उद्देश्य जितना दृढ़ होगा, उतना ही उसका परमात्मा के साथ संबंध प्रकट होगा । इससे संसार से माना हुआ संबंध मिट जाएगा । साधक में दैवी प्रकृति के संबंध प्रकट हो जाएंगे जो कि मुक्ति के कारण हैं ।

गीता श्लोक 16/06…

संपत्तियों का फल….

 

भगवान कहते हैं कि इस लोक में दो तरह के प्राणियों की सृष्टि है दैवी और आसुरी । दैवी को तो मैंने विस्तार से कह दिया, अब हे पार्थ ! तुम मुझसे आसुरी सृष्टि को विस्तार से सुनो ।

इस पृथ्वी के जीवों में प्राणी समुदाय दो तरह का है, दैवी और आसुर । तात्पर्य यह हुआ कि प्राणियों में परमात्मा और प्रकृति दोनों का अंश है । परमात्मा का अंश चेतन है तथा प्रकृति का अंश जड़ है । वह चेतन अंश जब परिवर्तनशील जड़ अंश के सम्मुख हो जाता है, तब उसमे आसुरी संपत्ति आ जाती है और जब वह जड़ प्रकृति से विमुख होकर केवल परमात्मा के सम्मुख हो जाता है, तब उसमें देवी संपत्ति जागृत हो जाती है । दैव नाम परमात्मा का है । परमात्मा की प्राप्ति के लिए जितने भी सद्गुण सदाचार आदि के साधन हैं, वे सब दैवी संपदा हैं । भगवान ने परमात्मा प्राप्ति साधन को अव्यय अर्थात अविनाशी कहा है । मनुष्य शरीर में दैवी और आसुर दोनों संपत्तियां हैं ।

गीता श्लोक 16/07…

आसुरी संपत्ति जैसे आती है?..

भगवान कहते हैं की आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य किस में प्रवृत्त होना चाहिए और किस में निवृत होना चाहिए, इसको नहीं जानते और उनमें न तो उनमें शुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा सत्य पालन ही होता है ।

प्रवृत्ति और निवृत्ति को कैसे जाना जाए, इसे तो गुरु के द्वारा या ग्रंथ के द्वारा या शुद्ध विचार के द्वारा जाना जा सकता है और कभी अचानक विशेष घटना हो जाने पर भी विवेक जागृत हो जाता है अथवा किसी महापुरुष के संपर्क में आने पर भी विवेक जागृत हो जाता है । कभी-कभी तीर्थ स्थलों में जाने पर भी विवेक जागृत हो जाता है । विवेक शक्ति मनुष्य में होती है । पशु पक्षियों में यह योग्यता नहीं होती । मनुष्य अपने विवेक से अपना और परिवरीजनों का पालन पोषण कर सकता है । सभी लोगों को सद्गुणों की ओर मोड़कर सदाचार की शिक्षा दे सकता है । यह गुण पशु और पक्षियों में नहीं मिलता ।

गीता श्लोक 16/08..

सत्कर्म न होने से सत्कर्म दब जाते हैं….

भगवान कहते हैं कि लोग कहा करते हैं कि संसार असत्य बिना मर्यादा के और बिना ईश्वर के अपने आप स्त्री पुरुष के सहयोग से पैदा हुआ है । इसलिए काम ही इसका कारण है । इसके सिवाय और क्या कारण है? और कारण हो ही नहीं सकता, ऐसा कहते हैं ।

जिनका स्वभाव आसुरी है,वही लोग कहते हैं कि यह जगत सत्य है । जितने भी यज्ञ, दान, तप, ध्यान,स्वाध्याय, तीरथ, व्रत, आदि शुभ कर्म किए हैं, उनको वह सत्य नहीं मानते । उनके लिए तो यह सब छलावा या बहकावा है ।

आस्तिक मनुष्यों की धर्म, ईश्वर परलोक अर्थात पुनर्जन्म में श्रद्धा होती है । परंतु आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य धर्म, ईश्वर आदि में विश्वास नहीं रखते हुए ऐसा मानते हैं कि इस संसार में धर्म, ईश्वर, पुण्य, पाप आदि कोई प्रतिष्ठा, मर्यादा नहीं है । वह इस जगत को बिना मालिक अर्थात बिना भगवान का कहते हैं । वह कहते हैं कि पुरुष को स्त्री की और स्त्री को पुरुष की कामना होती है । अतः उन दोनों के परस्पर सहयोग से यह संसार पैदा हुआ है । इसलिए काम ही इस संसार का कारण है । इसके लिए ईश्वर प्रारब्ध आदि की किसी की भी जरूरत नहीं है । ईश्वर आदि को इसमें कारण मनाना मिथ्या है । केवल दुनिया को वहकाना मात्र है ।

गीता श्लोक 16/09

नास्तिक दृष्टि वालों में सद्भाव पैदा नहीं होते ….

भगवान कहते हैं कि इस पूर्व कथन, नास्तिक दृष्टि का आश्रय लेने वाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूप को नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्र कर्म करने वाले और संसार के शत्रु हैं, उन मनुष्यों के सामर्थ का उपयोग जगत का नाश करने के लिए होता है ।

भगवान कहते हैं कि न कोई कर्तव्य _अकर्तव्य है, न शौचाचार_ सदाचार है, न ईश्वर है, न प्रारब्ध है, न पाप है, न पुण्य है, न लोक है, न परलोक है, न किए हुए कर्मों का दंड विधान है, ऐसी नास्तिक दृष्टि का आश्रय लेकर नास्तिक पुरुष चलते हैं । कोई चेतन तत्व है, वह ऐसा भी नहीं मानते । आत्मा की कोई सत्ता है, यह भी नहीं मानते । वे तो इस बात को मानते हैं कि जैसे कत्था और चूना मिलने पर एक लालिमा पैदा हो जाती है, ऐसे ही भौतिक तत्वों के मिल जाने से चेतना पैदा हो जाती है । उनकी दृष्टि में जड़ ही मुख्य है । इसलिए वह चेतन तत्व से दूरी बनाकर रहते हैं । चेतन तत्व से दूर रहने के कारण ही उनका पतन हो जाता है ।

गीता श्लोक 16/10..

सावधान न रहने से मनुष्य कामनाओं का सहारा लेता है…

 

भगवान कहते हैं कि कभी पूरी न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर दंभ, अभिमांन और मद अर्थात घमंड में चूर रहने वाले तथा अपवित्र व्रत करने वाले मनुष्य मोह के कारण दुराग्रहों को धारण करके संसार में विचरण करते रहते हैं ।

आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग कभी भी पूरी न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेते हैं । कामना के आश्रय के बिना आदमी की उन्नत नहीं हो सकती । कामना के आश्रित रहने वाले भगवान को, परमात्मा को, परलोक को, प्रारब्ध को, नहीं मानते ।

उनके व्रत नियम बड़े अपवित्र होते हैं । मूढ़ता के कारण वह तमाम दुराग्रहों को पकड़े रहते हैं। तामसी बुद्धि को लेकर चलना ही मूढ़ता है, या मूर्खता है। वह शास्त्रों की, वेदों की, वर्ण आश्रमों की और कुल परंपरा की मर्यादा को नहीं मानते । वे इनके विपरीत चलने में, इनको भ्रष्ट करने में, ही अपनी बहादुरी, अपना गौरव समझते हैं । वह कर्तव्य को ही अकर्तव्य और अकर्तव्य को कर्तव्य मानते हैं । वह हित को अहित और अहित को हित मानते हैं ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles