दक्षिण पूर्वी राजस्थान के हाडोती आंचल में कोटा जिले के रामगंज मंडी शहर से डेढ़ किलोमीटर दूर प्रकृति की सुरमय में गोद में बसा है, गांव खैराबाद धाम, प्राचीन काल से ही यह एक सिद्ध क्षेत्र माना जाता है, लगभग 5000 वर्ष पूर्व महाभारत काल में यहां पांडवों के आने का उल्लेख मिलता है, खैराबाद में ही रियासत के समय तहसील कार्यालय चलता था, खैराबाद धाम में भगवान श्री कृष्ण, शंकर और हनुमान जी के पुरातन मंदिर विभिन्न दिशाओं में स्थित है, कस्बे के मध्य में स्थित है लगभग 300 साल पुराना फलोदी माता का भव्य वह ऐतिहासिक मंदिर, मंदिर की चोटी पर पहराती लाल पटाका काफी दूर से नजर आती है, यह स्थल सिद्ध पीठ खैराबाद धाम के नाम से प्रसिद्ध है, मेड़त वाल वेशय समाज का यह एक तीर्थ स्थल है, फलोदी माता तथा उनकी पत्नी चंपावती ने 12 वर्ष तक भगवान शिव पार्वती की कठोर तपस्या की थी, शिव आराधना से खुश राजा रानी को तभी यह वरदान दिया कि तुम्हारा नाम संसार में हजारों वर्षों तक लिया जाता रहेगा, चाहे अनुसार वंश वृद्धि भी होगी, माता पार्वती ने वर दिया कि मैं स्वयं तुम्हारी कुलदेवी के रूप में पूजित रहूंगी, माता पार्वती को मां फलोदी कुलदेवी के रूप में पूजा जा रहा है, कहां जाता है कि लगभग 2000 साल पहले मेड़ता(नागौर) मेडत वालों का उद्गम स्थल माना जाता है राजपूताना में 84 वनिक जातियां थी, उन में सातवें नंबर पर मेडतवाल जाति का उल्लेख आता है, लोगों का मानना है कि फलोदी माता मेडत वाल गोत्र के माहेश्वरी महाजनों की पुत्री थी, भंडारी गोत्र में वैवाहिक लगने के दिन दो बारातो का आगमन हो गया, प्रथम बारात के बीद की हत्या के बाद उसे ही जीवन साथी मानकर माता ने भी मृत्यु का वर्णन कर लिया, कहते हैं कि इसके बाद मेड़ता छोड़ने के संकल्प के साथ बावन गोत्र के माहेश्वरी महाजन भी साथ चले, जो मेडत वाल महाजनों के बावन गोत्र के रूप में आज भी समाज में जाने जाते हैं, मेड़ता से पुष्कर, रावतभाटा, गागरोन झालावाड़, सुकेत, उसके बाद लगभग 300 साल पूर्व अंतिम पड़ाव खैराबाद में रहा, खैराबाद तक आते समय पौ फटने लगी लग गई, उसके बाद देवी फलोदी माता का यही विश्राम हो गया, तभी से खैराबाद में पूजित देवी मेडतवाल समाज की कुलदेवी मां फलोदी कहलाने लगी
नवरात्रि विशेष- रामगंज मंडी के गांव खैराबाद स्थित फलौदी माता का प्राचीन मंदिर






