ग़ज़ल
शकूर अनवर
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ऐशो-इशरत* की मय* बरसती दे।
ज़िंदगी दी तो मोज-मस्ती दे।।
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गेहूँ चावल अगरचे महॅंगे हैं।
इक मुहब्बत तो हमको सस्ती दे।।
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है तुझे देखने की ताब* किसे।
आँख दीदार* को तरसती दे।।
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डूब जाऊँ तेरे ख़यालों में।
इस बुलंदी पे ऐसी पस्ती* दे।।
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दौलते-दर्द शायरों को मिले।
उनकी ग़ज़लों में ग़मपरस्ती* दे।।
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जितने मज़लूम* हैं ज़माने में।
उनको तू अपनी सरपरस्ती* दे।।
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शरपसंदी* से दे निजात* “अनवर”।
अम्न* वालों को दिल की बस्ती दे।।
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शकूर अनवर
ऐशो-इशरत*सुख सुविधा,समृद्धि
मय*मदिरा,शराब
ताब*ताक़त,सामर्थ्य
दीदार*दर्शन
पस्ती*बहुत अधिक नीचे
ग़मपरस्ती*पीड़ाओं को समझना,उनका पोषण करना
मज़लूम*पीड़ित,दुखीजन
सरपरस्ती*संरक्षण
शरपसंदी*लड़ाई झगड़े के इच्छुक
निजात*छुटकारा,मुक्ति
अम्न*शांति
9460851271






