Saturday, July 11, 2026
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शब्द: घाव भी, मरहम भी परिवार में महत्व – संवाद से सँवरते रिश्ते

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥”

— संत कबीर

मनुष्य को प्रकृति से मिला सबसे अनमोल और प्रभावशाली उपहार है—वाणी। यही वाणी रिश्ते जोड़ती है, समाज का निर्माण करती है और कभी-कभी वर्षों का विश्वास एक क्षण में ढहा देती है। शस्त्रों के घाव तो समय के साथ भर जाते हैं, किंतु कटु शब्दों के घाव जीवनभर आत्मा को सालते रहते हैं।

आज के डिजिटल और सोशल मीडिया युग में शब्दों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ गई है। पहले जो शब्द चारदीवारी तक सीमित थे, आज वे एक क्लिक में लाखों लोगों तक पहुँच जाते हैं। ऐसे में हमारी ऑनलाइन वाणी भी हमारे व्यक्तित्व का दर्पण बन चुकी है।

वैचारिक क्रांति और वाणी के अमर पुरोधा

इतिहास गवाह है कि शब्दों ने युगों की दिशा बदली है। कुरुक्षेत्र के मैदान में श्रीकृष्ण के मुख से निकले ‘गीता’ के शब्दों ने ही मोहग्रस्त अर्जुन को कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ाया था। महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के आह्वान ने करोड़ों भारतीयों में स्वतंत्रता की अलख जगाई, तो स्वामी विवेकानन्द के शिकागो भाषण ने पूरे विश्व को भारतीय संस्कृति का मुरीद बना दिया। इन महापुरुषों की वास्तविक शक्ति उनकी शस्त्र विहीन, किंतु वैचारिक रूप से सुदृढ़ वाणी ही थी।

संवाद से सँवरते रिश्ते

घर ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि आपसी संवाद से बनता है। एक सकारात्मक और प्रेमपूर्ण शब्द बच्चे में आत्मविश्वास भर सकता है, जबकि निरंतर की जाने वाली कटु आलोचना उसके भविष्य को भीतर से कमजोर कर देती है। आज अनेक परिवारों में संवाद कम और विवाद अधिक दिखाई देते हैं; इसका बड़ा कारण यह है कि हम सुनने से अधिक बोलने लगे हैं। जब शब्दों में सम्मान और संवेदनशीलता होती है, तभी परिवार में सुख-शांति का वास होता है।

पद से बड़ा संवाद का प्रभाव

किसी भी लीडर, अधिकारी, शिक्षक या अभिभावक का प्रभाव उसके पद से नहीं, बल्कि उसकी भाषा से आंका जाता है। अहंकारपूर्ण भाषा दूरी बढ़ाती है, जबकि विनम्र संवाद विश्वास पैदा करता है। एक सच्चा नेतृत्व वही है जो कठोर निर्णय भी मानवीय और मर्यादित भाषा में व्यक्त करना जानता हो।

बोलने से पहले विवेक की कसौटी

यदि हम बोलने या सोशल मीडिया पर लिखने से पहले स्वयं से ये पाँच प्रश्न पूछ लें, तो अधिकांश विवाद स्वतः समाप्त हो जाएंगे:

1. क्या यह सत्य है?

2. क्या यह आवश्यक है?

3. क्या इससे किसी का अपमान तो नहीं होगा?

4. क्या इसे और अधिक विनम्र ढंग से कहा जा सकता है?

5. क्या यह समाज में सकारात्मकता बढ़ाएगा?

निष्कर्ष

शब्द बीज की तरह होते हैं; इनसे विश्वास, प्रेम और संस्कार के वृक्ष उगते हैं। यदि हम अपनी वाणी में संयम, करुणा और सत्य का समावेश कर लें, तो परिवार से लेकर समाज तक एक अभूतपूर्व परिवर्तन लाया जा सकता है। आइए, हम ऐसे शब्दों का चयन करें जो निराशा में आशा जगाएं और समाज में सद्भाव का मार्ग प्रशस्त करें।

— परमानन्द गोयल, कोटा (राज.)

 

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