Saturday, April 18, 2026
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ग़ज़ल- उड़ान अब आसमानी चाहती है- शकूर अनवर

ग़ज़ल

 

उड़ान अब आसमानी चाहती है।

मुहब्बत कामरानी* चाहती है।।

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तुम्हारी तिश्नगी* ने ख़ून माॅंगा।

हमारी प्यास पानी चाहती है।।

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किनारों से उबल पड़ती है अक्सर।

नदी तो ख़ुद रवानी* चाहती है।।

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तेरे चेहरे की ये रानाई* मुझसे।

मेरी जादू – बयानी* चाहती है।।

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सुकूनत*अब नहीं मुमकिन ज़मीं पर।

मकानी ला-मकानी* चाहती है।।

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कोई मेहमान ठहरे अब तो दिल में।

तबीयत मेज़बानी* चाहती है।।

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कोई तो मोड़ आये ज़िन्दगी में । हक़ीक़त भी कहानी चाहती है।।

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लड़ाती है हमें आपस में “अनवर”।

सियासत हुक्म रानी* चाहती है।।

*

शब्दार्थ

कामरानी*सफलता

तिशनगी*प्यास तृष्णा

रवानी*तेज़ी

रानाई*खूबसूरती सुंदरता

जादू -बयानी*चमत्कारिक वर्णन

सुकूनत*निवास

ला -मकानी*विश्व व्यापी घर

मेज़बानी*मेहमान नवाजी

हुक्मरानी*सत्ता

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✍शकूर  अनवर

📞9460851271

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