लेखक : परमानन्द गोयल (कोटा, राजस्थान)
कोटा/इक्कीसवीं शताब्दी का एक चौथाई समय बीत चुका है। इस अवधि में भारत ने तकनीक, संचार, स्वास्थ्य, परिवहन और बुनियादी ढांचे में अभूतपूर्व प्रगति की है। आज आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति भी सरकारी योजनाओं के माध्यम से रोटी, कपड़ा, मकान और शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं तक पहुँच पा रहा है। स्मार्टफोन, इंटरनेट और एआई (AI) के इस दौर में हमारी नई पीढ़ी (जेन जी और जेन अल्फा) ‘क्यों’ पूछने की ताकत के साथ आगे बढ़ रही है। लेकिन इन शानदार भौतिक उपलब्धियों के बीच एक यक्ष प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या हमारी सामाजिक और नागरिक चेतना भी उसी गति से विकसित हुई है, जिस गति से भौतिक विकास हुआ है?
आज भी राष्ट्रीय राजमार्गों पर सफर करते समय वाहन की खिड़की से कचरा बाहर फेंक देना, सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाना और बिजली- ट्रांसफार्मर से तेल की चोरी जैसी घटनाएँ आम हैं। अतिक्रमण की समस्या इतनी गंभीर है कि लोग अपने घरों या दुकानों के बाहर सार्वजनिक भूमि पर कब्जा कर उसे निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करने लगते हैं।
दैनिक जीवन की विसंगतियाँ:
गुटका खाकर कहीं भी थूक देना, चौराहे पर पुलिस देखकर ही हेलमेट पहनना, जाम में कतार तोड़कर आगे निकलने की होड़, और समारोहों में थाली में भोजन व्यर्थ छोड़ना—ये सभी व्यवहार हमारी संकीर्ण सामाजिक सोच को दर्शाते हैं। यहाँ तक कि धार्मिक आस्था के नाम पर भी हम अनजाने में अनुशासन की सीमाएँ लाँघ जाते हैं; जैसे सार्वजनिक पार्कों या दूसरों की दीवारों से फूल तोड़ना।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन व्यवहारों का हमारी अगली पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? बच्चे उपदेशों से नहीं, बल्कि अपनों को देखकर सीखते हैं। जब एक बच्चा अपने माता-पिता को ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते या सड़क पर कचरा फेंकते देखता है, तो वह अनजाने में इसे ही सामान्य मान लेता है। संस्कार और नागरिक बोध पुस्तकों से नहीं, बल्कि पारिवारिक आचरण से निर्मित होते हैं।
शहरीकरण के बढ़ने से संसाधनों पर दबाव बढ़ा है, जिससे आवारा पशुओं और अतिक्रमण जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हुई हैं। गाय को हमारी संस्कृति में पूजनीय माना गया है, लेकिन दूध निकालने के बाद उसे सड़कों पर लावारिस छोड़ देना और सड़क के बीचोबीच चारा डालना दुर्घटनाओं को आमंत्रण देता है। आज सरकारें शहरों को सुंदर बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं, लेकिन यदि नागरिक स्वयं सड़कों पर कचरा और अतिक्रमण करते रहेंगे, तो विकास का वास्तविक उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो पाएगा।
किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों या डिजिटल तकनीक से नहीं मापी जाती। उसकी वास्तविक पहचान नागरिकों के आचरण, अनुशासन, ईमानदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व से होती है। जापान और सिंगापुर जैसे देशों की सफलता के पीछे उनकी आर्थिक समृद्धि से ज्यादा वहाँ का नागरिक अनुशासन है।
यदि हमें ‘विकसित भारत’ का सपना साकार करना है, तो हमें अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी पहचानना होगा। सुधार की शुरुआत किसी और से नहीं, बल्कि स्वयं से करनी होगी।
निष्कर्ष:
विकास की असली पहचान यह नहीं कि हमारे पास क्या है, बल्कि यह है कि हम जो कुछ हमारे पास है, उसके प्रति कितने जिम्मेदार हैं। एक बेहतर समाज का निर्माण केवल सरकारें नहीं, बल्कि जागरूक और संवेदनशील नागरिक करते हैं।
क्या हम सचमुच सही दिशा में बढ़ रहे हैं ? विकास के साथ नागरिक चेतना का प्रश्न — परमानन्द गोयल





सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन व्यवहारों का हमारी अगली पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? बच्चे उपदेशों से नहीं, बल्कि अपनों को देखकर सीखते हैं। जब एक बच्चा अपने माता-पिता को ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते या सड़क पर कचरा फेंकते देखता है, तो वह अनजाने में इसे ही सामान्य मान लेता है। संस्कार और नागरिक बोध पुस्तकों से नहीं, बल्कि पारिवारिक आचरण से निर्मित होते हैं।
