Thursday, May 28, 2026
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ग़ज़ल- कैसी माहौल* में निगरानी* है

ग़ज़ल

कैसी माहौल* में गिरानी* है। 

कितनी मुश्किल में ज़िंदगानी है।।

*

क़ाफ़िला खो गया सराबों* में।

“हमको धोखा ये था कि पानी है”।।

*

इसमें मिलना था फिर बिछड़ना था।

बस मुहब्बत की ये कहानी है।।

 

हौसला ही नहीं हो जब दिल में।

कैसे कहदें कि ये जवानी है।।

 

क़र्ज़ चुकता नहीं कभी इसमें।

यही खेती यही किसानी है।।

 

बेवफ़ाई शुआर* है उसका।

उसकी आदत वही पुरानी है।।

 

ऑंख रस्ता है शहरे -उल्फ़त* का।

दिल मुहब्बत की राजधानी है।।

 

दश्तो-सहरा* में है क़याम*अब तो।

लामकानी* ही अब मकानी है।।

 

क्यूँ उबलता नहीं है ख़ून “अनवर”।

क्या हमारी नसों में पानी है।।

*

शब्दार्थ:-

माहौल*वातावरण

गिरानी*मॅंहगाई सख़्ती

सराबों में*मरीचिकाओं में

शुआर*तरीका आदत

शहरे-उल्फ़त*प्रेमनगर

दश्तो-सेहरा*जंगल और रेगिस्तान

कयाम*निवास

लामकानी* विश्वव्यापी घर मकान रहित

शकूर अनवर

9460851271

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