वो दूर होकर भी हर रोज़ मेरी बलाएँ लेती है ,
मैं रहूँ सलामत हर पल ही वो रोज़ दुआएं देती है ,
मैं छोड़ के आया हूँ उस को गाँव के कच्चे घर में ,
वो ढूँढती रहती हे मुझको घर के इक इक पत्थर में,
मुझसे बातें करती है तो हंस लेती है वो थोड़ा सा ,
तन्हाई में रो रो करके खुद को सजाएँ देती है…..
मैं लाता हूँ जब शहर उसे ,हंस के वो संग आ जाती है ,
देख तरक्की मेरी फिर वो फूले नहीं समाती है ,
मेरी भागदौड़ जीवन की उठापटक से थोड़ा थोड़ा घबराती है ,
उसकी आँखों में छिपी नमी की खबर फिज़ाएँ देती है ,
मैं रहूँ सलामत हर पल ही वो रोज़ दुआएं देती है …….
जब हाथ वो रखती है सिर पे ,मैं चिंतामुक्त हो जाता हूँ ,
जब आँचल में छिपाती है ,अपने बचपन में खो जाता हूँ,
या रब रखना तू सलामत जब तक सूरज चाँद है ,
मेरी साँसें ऐ मालिक तुझको बस ये सदाएं देती है ,
मैं रहूँ सलामत हर पल ही वो रोज़ दुआएँ देती है !
स्वरचित:- कृष्ण”राम”पंकज




