Sunday, April 19, 2026
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वह दूर होकर भी हर रोज़ मेरी बलाएँ लेती है- शायर कृष्णा ‘राम’ पंकज

वो दूर होकर भी हर रोज़ मेरी बलाएँ लेती है ,

मैं रहूँ सलामत हर पल ही वो रोज़ दुआएं देती है ,

 

मैं छोड़ के आया हूँ उस को गाँव के कच्चे घर में ,

वो ढूँढती रहती हे मुझको घर के इक इक पत्थर में,

मुझसे बातें करती है तो हंस लेती है वो थोड़ा सा ,

तन्हाई में रो रो करके खुद को सजाएँ देती है…..

मैं लाता हूँ जब शहर उसे ,हंस के वो संग आ जाती है ,

देख तरक्की मेरी फिर वो फूले नहीं समाती है ,

मेरी भागदौड़ जीवन की उठापटक से थोड़ा थोड़ा घबराती है ,

उसकी आँखों में छिपी नमी की खबर फिज़ाएँ देती है ,

मैं रहूँ सलामत हर पल ही वो रोज़ दुआएं देती है …….

जब हाथ वो रखती है सिर पे ,मैं चिंतामुक्त हो जाता हूँ ,

जब आँचल में छिपाती है ,अपने बचपन में खो जाता हूँ,

या रब रखना तू सलामत जब तक सूरज चाँद है ,

मेरी साँसें ऐ मालिक तुझको बस ये सदाएं देती है ,

मैं रहूँ सलामत हर पल ही वो रोज़ दुआएँ देती है !

स्वरचित:- कृष्ण”राम”पंकज

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