Sunday, April 19, 2026
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ग़ज़ल -गुज़रते आजकल कैसे मुझे दिन रात लिखने दो- राम शर्मा

 

 

गुज़रते आजकल कैसे मुझे दिन रात लिखने दो।

जला है दिल मचा क्यों ज़लज़ला वो बात लिखने दो।।

*

दिखावा था छलावा था समझ में कुछ नहीं आया।

उलझते जो गए पागल वही जज़्बात लिखने दो।।।

*

बनाया था कभी ईश्वर, नज़र उनकी मगर बदली।

नज़र अंदाज़ करके जो बनी औक़ात लिखने दो।।

*

ज़रूरी है कि तुम जीतो सदा ही प्यार में सजनी।

जिता कर आपको जो पा गया वो मात लिखने दो।।

*

अभी भी आप से टकरा कभी निकला कहीं से भी।

छिपाती ‘राम’ की पलकें वही बरसात लिखने दो।।

*

 

 राम शर्मा काप्रेन

‘कोटा’

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