गुज़रते आजकल कैसे मुझे दिन रात लिखने दो।
जला है दिल मचा क्यों ज़लज़ला वो बात लिखने दो।।
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दिखावा था छलावा था समझ में कुछ नहीं आया।
उलझते जो गए पागल वही जज़्बात लिखने दो।।।
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बनाया था कभी ईश्वर, नज़र उनकी मगर बदली।
नज़र अंदाज़ करके जो बनी औक़ात लिखने दो।।
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ज़रूरी है कि तुम जीतो सदा ही प्यार में सजनी।
जिता कर आपको जो पा गया वो मात लिखने दो।।
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अभी भी आप से टकरा कभी निकला कहीं से भी।
छिपाती ‘राम’ की पलकें वही बरसात लिखने दो।।
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राम शर्मा काप्रेन
‘कोटा’





