Monday, September 21, 2026
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धर्मों रक्षते रक्षितः, यतो धर्मस्ततो जयः — 108 श्री जयकीर्ति जी मुनिराज

भारत सिंह चौहान

कोटा/राम कथाकार एवं अनुष्ठान विशेषज्ञ परम पूज्य ध्यान दिवाकर मुनि प्रवर 108 श्री जयकीर्ति जी मुनिराज के मुखारविंद से प्रवाहित हो रही भव्य राम कथा के तृतीय दिवस ने रामपुरा के अकलंक स्कूल में उपस्थित श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। मधुर संगीत और दिव्य ध्वनि में सुनाई गई जैन धर्म आधारित राम कथा ने श्रोताओं के हृदय को भक्ति और वैराग्य से सराबोर कर दिया।

एसोसिएश के अध्यक्ष पीयूष बज एंव सचिव अनिमेष जैन ने बताया कि धर्म आयोजन में जिनवाणी भेटकर्ता विमलचंद, मनोज, साधना, पीयूष-पिंकी, शोभित-प्रीति तथा नुवान सरपटीया (मूवासवाला) विजयपाडा परिवार, राजा श्रेणिक पद्मकुमार-विद्युलता, राहुल-सोना और अनन्य को सौभाग्य मिला। मंगलाचरण में मैना जी, साधना और मीना गंगवाल तथा पदप्रक्षालन में अकलंक स्कूल के अध्यक्ष पीयूष बज को सौभाग्य प्राप्त किया।

कपिल ब्राह्मण का जीवन परिवर्तन

गुरुदेव ने राम-लक्ष्मण-सीता के वनवास प्रसंग में कपिल ब्राह्मण की कथा सुनाते हुए बताया कि किस प्रकार अहंकारवश अपमान करने वाले कपिल ब्राह्मण का जीवन मुनिराज के धर्मोपदेश से पूर्णतः बदल गया। यक्ष द्वारा निर्मित भव्य नगर को देखकर आश्चर्यचकित ब्राह्मण ने मुनिराज से उपदेश सुना और अपनी पत्नी के साथ अणुव्रत धारण किया। प्रभु श्री राम से मिलने के पश्चात् उनकी दरिद्रता दूर हुई और पश्चाताप करते हुए उन्होंने अरिहंत नाम के रसायन को प्राप्त कर जिनदीक्षा ली।

लक्ष्मण का विवाह और अतिवीर्य राजा का वैराग्य

कथा में आगे बताया गया कि लक्ष्मण का विवाह वरमाला के साथ संपन्न हुआ। भरत के निर्बाध राज्य में बाधा उत्पन्न करने वाले अतिवीर्य राजा से राम-लक्ष्मण का युद्ध हुआ। पराजय के बाद अतिवीर्य को संसार से वैराग्य हो गया और उन्होंने निर्ग्रंथ पद धारण कर लिया।

द्वय मुनिराज को केवलज्ञान की प्राप्ति

वंशधर पर्वत पर पहुंचकर राम-लक्ष्मण-सीता ने ध्यानस्थ द्वय मुनिराज के उपसर्ग को दूर किया, जिससे उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। देशभूषण-कुलभूषण मुनिराज की वंदना कर वे आगे बढ़े। नदी तट पर सीता ने उत्तम द्रव्यों से भोजन बनाकर गुप्ति-सुगुप्ति नामक चारण ऋद्धिधारी मुनिराज को आहारदान दिया।

जटायु का जीवन परिवर्तन

एक कुरूप गिद्ध (जटायु) ने मुनिराज के चरणोदक सेवन से अपना शरीर रत्नमय सुंदर पाया। जातिस्मरण होने पर उसे अत्यंत पश्चाताप हुआ और मुनिराज से पूर्वभव का वृतांत सुनकर उसने अणुव्रत धारण किए। गुरुदेव ने इस प्रसंग से संदेश दिया कि जिनशासन से बड़ी कोई विभूति नहीं और मुनिराज प्राणीमात्र के कल्याणकारी हैं।

धर्मसभा में गुरुदेव ने अनेक जीवनोपयोगी नीतियां बताईं। उन्होंने कहा कि जो देव-शास्त्र-गुरु के समक्ष भक्तिपूर्वक नाचते हैं, उन्हें संसार के सामने नहीं नाचना पड़ता। धर्म के साथ रहने वाला थोड़ा धन भी स्वर्ण से कीमती है, जबकि धर्मविहीन धन मिट्टी के समान है। गुरु की विद्या या कला सीखने के लिए उसमें पूर्णतः तल्लीन होना आवश्यक है।

उन्होंने कहा, “धर्मों रक्षते रक्षितः, यतो धर्मस्ततो जयः। संसार में सभी अवसर बार-बार मिल सकते हैं, किंतु साधु सेवा का अवसर अत्यंत दुर्लभ है। जितने विश्वास और समर्पण से साधु सेवा की जाती है, उतना ही फल प्राप्त होता है।”

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