महारानी पद्मिनी और रावल रतन सिंह…..
मुस्लिम शासक अलाउद्दीन खिलजी की कुदृष्टि चित्तौड़ दुर्ग पर पड़ी । रावल रतन सिंह ने वीरता पूर्वक सामना किया । अलाउद्दीन की विशाल सेना से रतन सिंह के मुट्ठीभर वीरों ने अदम्य साहस का परिचय दिया । रावल रतन सिंह अदभुत शौर्य का परिचय देते हुए, रणभूमि में खेत रहे । रानी पद्मिनी ने अन्य रानियों के साथ जौहर का वरण किया । इस प्रकार अलाउद्दीन के हाथ सिर्फ खाक ही लग पाई। इसी वृतांत को काव्य में बांधने का एक प्रयास आपके समक्ष प्रस्तुत है _ _
रतन सिंह की फौज को, लिया किले में घेर।
इस सब का कारण रहा, ग्रह राशि का फेर ।।
एक लुटेरा नीच था, अलाउद्दीन था नाम ।
अगणित इच्छा पाल लीं, लूट मार का काम।।
रावल रतन उदास थे, रक्षा बड़ा था प्रश्न ।
अधम अलाउद्दीन तो, मना रहा था जश्न ।।
प्रश्न थे रावल के लिए, कैसे बचे चित्तौर ।
कठिन परीक्षा दे रहा, बात न सूझे और ।।
आखिर चित्तौड़गढ़ के किले का क्या हुआ ……
गढ़, नीच हाथ में जा रहा, अंधकार चहुं ओर ।
चिन्ताएं अगणित रहीं, जिनका ओर न छोर ।।
सुंदरियां चित्तौड़ में, रहीं एक से एक ।
इस पापी सुलतान की, नजर नहीं थी नेक ।।
कुमकुम अंतिम बार का, सज गया सब के भाल ।
राज्ञी बिल्कुल नहीं डरी, गई काल के गाल ।।
बिन चिंता आगे बढ़ी, रानी सबके साथ ।
अग्नि कुंड में जीत थी, बचा नहीं कुछ हाथ ।।
रानी जौहर कर गई, बहुत गईं थीं जान ।
नाम अमर वह कर गई, उसकी यह पहचान ।।
चित्तौड़ वहीं, आज भी, अब शेष नहीं है रानि ।
सदा सदा को मिट गई, सुंदरता की खानि ।।
अद्भुत शौर्य दिखा गई, न कोई था अवसाद । ।
देशभक्त सारे करें, उनको मन से याद ।।
उनको मन से याद….
उनको मन से याद….
के. सी. राजपूत, कोटा।
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