Saturday, April 18, 2026
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आज़ाद नज्म-घानी का बैल *सलीम अफ़रीदी*

आज़ाद नज़्म

*”घानी का बैल”*

*परेशां हाल, दिन भर के थके हारे,कभी पहुंचे* *हो अपने घर,*

*किसी को देर से दरवाज़ा खोले, राह तकता,* *फ़िक्र करता, मुन्तज़िर पाया कभी तुमने,*

*कभी ऐसा हुआ है क्या?*

*तुम्हें देखा तो इक मुस्कान मीठी सी लबों पर*

*क्या कभी आई किसी के,*

*क्यों! कभी ऐसा हुआ है क्या?*

*तुम्हारे हाथ से सामान आगे बढ़ के थामा है* *किसी ने,*

*क्या कोई पानी का ठंडा ग्लास लाया है,* *बताओ ना,*

*कभी ऐसा हुआ है क्या?*

*कभी बिजली नहीं थी और गर्मी से परेशां थे,* *किसी ने अपने पल्लू से हवा की है कभी तुम* *पर,*

*कभी ऐसा हुआ है क्या?*

*यूं दिन भर की मशक़्क़त से थकन से चूर,* *तुम आराम करने को कभी लेटे हो बिस्तर* *पर, किसी के नर्म हाथों नें दबाए क्या तुम्हारे* *दुखते पैरों को,*

*कभी ऐसा हुआ है क्या?*

*नहीं! ऐसा नहीं होता,*

*हमेशा शाम को लौटा हूं मैं घर तो सभी* *मौजूद होते हैं,*

*हज़ारों ख़्वाहिशें लेकर बिला ताख़ैर, मुझ पर* *टूट पड़ते हैं,*

*हरिक चेहरे पे कुछ ऐसे तक़ाज़े देखता हूं तो* *मुझे एहसास होता है,*

*कि जैसे मैं कोई मुजरिम हूं उन सब का,*

*ये सब कुछ देख कर अपनी थकन तक भूल* *जाता हूं,*

*कहां साहब! अकेला मैं कमाता हूं,*

*मैं कितना भी कमा लाऊं मगर उनको हमेशा* *कम ही लगता है,*

*मुझे इल्ज़ाम देते हैं वो सब अपने अभावों का* *मुझे इंसान मत समझो,*

*महज़ घानी का मैं इक बैल बन कर रह गया* *घर में,*

*बरसते जिस पे चाबुक हैं,*

*अभी तुमने जो पूछा हैं,मेरी बेचारगी की* *ज़िन्दगी में,*

*इस तरह का मौजज़ा होगा?*

*नहीं ऐसा नहीं होता, कभी ऐसा नहीं होगा।*

*नहीं ऐसा नहीं होता, कभी ऐसा नहीं होगा।*

✍ *(सलीम आफ़रीदी)*

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